नई दिल्ली। भारत ने एयरोस्पेस और रक्षा तकनीक के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने देश का पहला स्वदेशी 350 किलोग्राम थ्रस्ट श्रेणी का एक्सपेंडेबल टर्बोजेट इंजन विकसित किया है। इस उपलब्धि के साथ भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो गया है, जो इस तरह की अत्याधुनिक इंजन तकनीक विकसित करने में सक्षम हैं।
इस इंजन को DRDO की एयरोनॉटिकल प्रणाली से जुड़ी प्रयोगशाला गैस टर्बाइन रिसर्च इस्टैब्लिशमेंट (GTRE) ने डिजाइन किया है। इसके निर्माण और असेंबली के लिए हैदराबाद की कंपनी अजाद इंजीनियरिंग को उद्योग साझेदार बनाया गया था। कंपनी ने 22 जुलाई को तैयार इंजन GTRE को सौंपा, जिसे भारतीय रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्र में महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है।
एक्सपेंडेबल टर्बोजेट इंजन का इस्तेमाल मुख्य रूप से ऐसे प्लेटफॉर्म में किया जाता है, जहां कम लागत, तेज गति और एक बार उपयोग वाली प्रणोदन प्रणाली की आवश्यकता होती है। यह इंजन भविष्य में ड्रोन, क्रूज मिसाइल और अन्य मानवरहित प्रणालियों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है। इससे भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमताओं को मजबूती मिलने की उम्मीद है।
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, जेट इंजन तकनीक दुनिया की सबसे जटिल इंजीनियरिंग क्षमताओं में शामिल है। इसके लिए उच्च तापमान सहने वाली सामग्री, अत्यधिक सटीक निर्माण और उन्नत डिजाइन क्षमता की जरूरत होती है। इस तकनीक में महारत हासिल करने वाले देशों की संख्या सीमित है।
यह उपलब्धि भारत के रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता अभियान को गति देने वाली मानी जा रही है। वैज्ञानिकों और उद्योग के बीच सहयोग से विकसित यह इंजन देश में उन्नत प्रणोदन तकनीक के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। अधिकारियों के अनुसार, आगे इस तकनीक को और बेहतर बनाने तथा इसके विभिन्न उपयोगों की संभावनाओं पर काम किया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्वदेशी टर्बोजेट इंजन का विकास भारत की रक्षा तैयारियों के साथ-साथ घरेलू एयरोस्पेस उद्योग के विस्तार के लिए भी अहम साबित होगा। यह उपलब्धि भविष्य की मानवरहित हवाई प्रणालियों और आधुनिक युद्ध तकनीकों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।





