नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने कहा है कि हिंदुत्व किसी के खिलाफ नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि सभी को साथ लेकर चलना और हर व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करना हिंदुत्व की मूल भावना है। वह गुरुवार को नई दिल्ली में ‘विश्वसंचार हिंदुत्व का’ पुस्तक के विमोचन कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे।
राधाकृष्णन ने कहा कि समाज में सभी लोगों को साथ लेकर चलने के साथ उनके व्यक्तिगत अधिकारों का संरक्षण भी जरूरी है। किसी के अधिकारों का अतिक्रमण करना हिंदुत्व या धर्म की भावना नहीं है। उन्होंने कहा कि हिंदुत्व को अक्सर दूसरों के खिलाफ खड़े होने के विचार के रूप में देखा जाता है, जबकि उनके अनुसार इसका अर्थ ऐसा नहीं है।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि हिंदुत्व के अलग-अलग ऐतिहासिक और बौद्धिक संदर्भों में विभिन्न अर्थ और व्याख्याएं सामने आई हैं। राजनीतिक विचारकों, विद्वानों, संगठनों और आलोचकों ने इसे अलग-अलग नजरिए से समझाया है। इसलिए इस विषय को समझने के लिए इसके ऐतिहासिक विकास और दार्शनिक पहलुओं का अध्ययन आवश्यक है।
उन्होंने सांस्कृतिक हिंदुत्व को मूल्यों, सांस्कृतिक जीवन के आदर्शों, मानवीय संबंधों और सार्वभौमिक कल्याण से जोड़ते हुए कहा कि समाज में विविधता के बावजूद एकता संभव है।
आरएसएस के साथ अपने लंबे जुड़ाव का उल्लेख करते हुए राधाकृष्णन ने संगठन के इतिहास और उसके विस्तार पर भी बात की। उन्होंने कहा कि आरएसएस की स्थापना 1925 में हुई थी और समय के साथ इसका विस्तार विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों तक हुआ है।
उपराष्ट्रपति ने युवाओं से भारतीय सभ्यतागत विरासत को पढ़ने, सवाल पूछने और उसके विभिन्न पहलुओं को समझने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि देश की सांस्कृतिक विरासत को समझते हुए संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जागरूक रहना भी जरूरी है।





