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नंदा देवी राजजात: 280 किमी की कठिन पैदल यात्रा, 20 पड़ावों से होकर पहुंचेगी मां नंदा की डोली

चमोली। उत्तराखंड की प्रसिद्ध नंदा देवी राजजात यात्रा को एशिया की सबसे लंबी धार्मिक पैदल यात्राओं में गिना जाता है। करीब 280 किलोमीटर लंबी यह यात्रा हिमालय के दुर्गम रास्तों, घने जंगलों, बुग्यालों और ऊंचाई वाले क्षेत्रों से होकर गुजरती है। धार्मिक आस्था के साथ-साथ यह यात्रा उत्तराखंड की लोक संस्कृति और परंपराओं का भी महत्वपूर्ण प्रतीक है।

परंपरा के अनुसार यात्रा मां नंदा देवी की डोली और चौसिंग्या खाडू (चार सींग वाला मेढ़ा) की अगुआई में आगे बढ़ती है। चौसिंग्या खाडू को यात्रा का विशेष धार्मिक प्रतीक माना जाता है। यात्रा के दौरान श्रद्धालु कठिन पहाड़ी मार्गों को पैदल पार करते हुए विभिन्न पड़ावों पर रात्रि विश्राम करते हैं।

यात्रा के मार्ग में करीब 20 प्रमुख पड़ाव आते हैं। नौटी से शुरू होकर यात्रा कांसुवा, भगौती, कुलसारी, नंदकेसरी, वाण, बेदनी बुग्याल, रूपकुंड और ज्यूरागली सहित कई दुर्गम क्षेत्रों से गुजरती है। ऊंचाई बढ़ने के साथ यात्रा की कठिनाई भी बढ़ती जाती है। अंतिम चरण में श्रद्धालु हिमालय के ऊंचे और कठिन भूभाग को पार करते हुए होमकुंड क्षेत्र तक पहुंचते हैं।

नंदा देवी को उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं अंचल में विशेष श्रद्धा के साथ पूजा जाता है। यात्रा में विभिन्न क्षेत्रों से देवी-देवताओं की डोलियां और छंतोलियां भी शामिल होती हैं। इससे यह आयोजन धार्मिक यात्रा के साथ-साथ गढ़वाल-कुमाऊं की सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक बन जाता है।

नंदा देवी राजजात का आयोजन परंपरागत रूप से 12 वर्ष में एक बार होता है। इसे कई बार ‘हिमालय का महाकुंभ’ भी कहा जाता है। यात्रा से जुड़े गांवों में श्रद्धालुओं के स्वागत, भोजन और ठहरने की व्यवस्थाएं स्थानीय लोग मिलकर करते हैं।

280 किलोमीटर की यह यात्रा केवल धार्मिक आस्था का सफर नहीं, बल्कि हिमालय की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बीच सदियों पुरानी परंपराओं, लोक संस्कृति और सामुदायिक सहभागिता का अनूठा उदाहरण है।

 

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