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हिमालयी ग्लेशियल झीलों पर IIT रुड़की की नजर, बाढ़ का खतरा टालने के लिए होगी निगरानी

रुड़की। नेपाल में हालिया विनाशकारी बाढ़ के बाद हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों से उत्पन्न होने वाले खतरे को लेकर चिंता बढ़ गई है। इसी बीच आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिकों ने हिमालयी ग्लेशियल झीलों की निगरानी और उनके विस्तार का अध्ययन करने की जरूरत पर जोर दिया है। वैज्ञानिकों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों के पिघलने से कई झीलों का आकार बढ़ रहा है, जिससे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) का खतरा बढ़ सकता है।

बढ़ रही हैं ग्लेशियल झीलें

आईआईटी रुड़की के अध्ययन में हाई माउंटेन एशिया क्षेत्र में 31,698 ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई है। अध्ययन के मुताबिक 2016 से 2024 के बीच इन झीलों के कुल क्षेत्रफल में लगभग 5.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई। वैज्ञानिकों ने उपग्रह आधारित तकनीक की मदद से झीलों के आकार और उनमें हो रहे बदलावों का विश्लेषण किया है।

ग्लेशियल झीलें सामान्यतः ग्लेशियरों के पीछे हटने और बर्फ पिघलने से बनती हैं। इन झीलों को कई बार बर्फ, मलबे और चट्टानों से बनी प्राकृतिक दीवार रोकती है। यदि यह प्राकृतिक बांध टूट जाए तो अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर तेजी से बह सकता है। इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड कहा जाता है।

समय रहते चेतावनी जरूरी

वैज्ञानिकों का मानना है कि संवेदनशील झीलों की नियमित निगरानी के साथ-साथ शुरुआती चेतावनी प्रणाली मजबूत करना बेहद जरूरी है। उपग्रहों और जमीन पर लगाए गए सेंसर से जलस्तर, झील के विस्तार और आसपास की परिस्थितियों में होने वाले बदलावों की जानकारी समय रहते हासिल की जा सकती है।

केंद्र सरकार भी ग्लेशियल झीलों की निगरानी कर रही है। केंद्रीय जल आयोग हिमालयी क्षेत्र में बड़े ग्लेशियल जल निकायों की नियमित निगरानी करता है, जबकि उच्च जोखिम वाली झीलों की पहचान कर उनके लिए शुरुआती चेतावनी और जोखिम कम करने के उपाय किए जा रहे हैं।

उत्तराखंड में भी ग्लेशियल झीलों से जुड़े जोखिम को कम करने के लिए निगरानी, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और वैज्ञानिक अध्ययन पर जोर दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्रों में बदलते मौसम और तेजी से पिघलते ग्लेशियरों को देखते हुए समय रहते खतरे की पहचान और स्थानीय स्तर पर चेतावनी ही जान-माल के नुकसान को कम करने में अहम भूमिका निभा सकती है।

 

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