पिथौरागढ़, 2 सितंबर। चीन सीमा से सटे व्यास घाटी के अंतिम गांव कुटी में 12 वर्ष बाद सात दिवसीय कुंभ पूजा का आयोजन हुआ। करीब 12,303 फीट की ऊंचाई पर बसे इस गांव में आयोजित धार्मिक अनुष्ठान में रं समाज की समृद्ध संस्कृति, परंपरा और लोक आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिला। पूजा में दारमा, चौंदास और व्यास घाटी के अलावा नेपाल में ब्याही गईं 200 से अधिक बेटियां और बहनें भी मायके पहुंचीं।
पारंपरिक वेशभूषा में निकली शोभायात्रा
15 से 21 अगस्त तक चले कुंभ पूजा कार्यक्रम में ग्रामीणों ने पारंपरिक वेशभूषा और वाद्य यंत्रों के साथ पंचायत घर से देव प्रांगण तक पारंपरिक नृत्य किया। इसके बाद विधि-विधान से देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना कर देश, प्रदेश और क्षेत्र की खुशहाली की कामना की गई। लमाओं (पुजारियों) ने हया गुलच, हया मापंग और हया नमच्यल सहित अन्य देवी-देवताओं की पूजा की।
मायके पहुंचीं बेटियां हुईं भावुक
कई वर्षों बाद कुंभ पूजा में शामिल होने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों और नेपाल से बेटियां अपने मायके पहुंचीं। परिजनों और पुराने परिचितों से मिलकर कई महिलाएं भावुक हो उठीं। ग्रामीण महिलाओं ने मायके आई बेटियों और बहनों का स्वागत किया। उन्हें शॉल ओढ़ाकर और स्मृति चिह्न देकर सम्मानित भी किया गया।
एक हजार पौधे रोपकर दिया पर्यावरण संदेश
कुंभ पूजा के दौरान पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया गया। माउंट एवरेस्ट विजेता सुमन कुटियाल दताल ने अपने परिजनों के साथ गांव में पौधारोपण किया। वन विभाग से प्राप्त देवदार, बांज और बांस के करीब एक हजार पौधे गांव के विभिन्न स्थानों पर लगाए गए।
इस आयोजन ने न केवल धार्मिक आस्था को मजबूत किया, बल्कि वर्षों से बिछड़े परिवारों को फिर से जोड़ने और रं समाज की पारंपरिक संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का भी काम किया।





