नई दिल्ली। विदेशी अंशदान विनियमन कानून (FCRA) में प्रस्तावित बदलावों को लेकर उठ रहे सवालों के बीच भारत ने वैश्विक समुदाय को आश्वस्त करने की कोशिश की है। सरकार ने ‘मिथ बनाम तथ्य’ के जरिए स्पष्ट किया है कि प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य विदेशी फंड पर पूरी तरह रोक लगाना नहीं, बल्कि उसके इस्तेमाल में पारदर्शिता, जवाबदेही और राष्ट्रीय हित सुनिश्चित करना है।
सरकार के अनुसार यह धारणा गलत है कि FCRA विदेशी चंदा प्राप्त करने वाले गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) पर प्रतिबंध लगाता है। कानून विदेशी योगदान प्राप्त करने के लिए पंजीकरण और वित्तीय विवरण की जानकारी देने जैसी शर्तें तय करता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2024-25 में करीब 16,200 संगठन FCRA के तहत पंजीकृत थे और उन्हें लगभग 22,963 करोड़ रुपये का विदेशी अंशदान मिला।
सरकार ने यह भी कहा कि विदेशी फंड को नियंत्रित करने वाली व्यवस्था केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और कनाडा में भी विदेशी प्रभाव और धन के नियमन से जुड़े कानून लागू हैं। यूरोपीय संघ में भी ऐसी व्यवस्था विकसित की जा रही है। भारत का तर्क है कि वैश्विक स्तर पर लोकतांत्रिक देश विदेशी वित्तीय प्रवाह और संभावित बाहरी प्रभाव की निगरानी को महत्व दे रहे हैं।
एक अन्य प्रमुख सवाल पर सरकार ने स्पष्ट किया कि FCRA किसी विशेष धर्म या समुदाय को निशाना बनाने के लिए नहीं है। इसके प्रावधान सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होते हैं। सरकार के अनुसार धार्मिक और सामाजिक कल्याण से जुड़े संगठन भी निर्धारित नियमों के तहत विदेशी योगदान प्राप्त कर सकते हैं।
FCRA संशोधन विधेयक, 2026 में विदेशी अंशदान और उससे जुड़ी संपत्तियों के प्रबंधन तथा निगरानी के लिए नई व्यवस्था का प्रस्ताव है। प्रमाणपत्र रद्द होने, वापस किए जाने या समाप्त होने की स्थिति में विदेशी योगदान और संपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक नामित प्राधिकरण बनाने का प्रावधान भी प्रस्तावित है।
सरकार का कहना है कि इन बदलावों का व्यापक उद्देश्य विदेशी धन के दुरुपयोग को रोकना, वित्तीय पारदर्शिता बढ़ाना और देश की संप्रभुता तथा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हितों की रक्षा करना है।





