नई दिल्ली। संसद के मानसून सत्र के अंतिम सप्ताह में सरकार की रणनीति में बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) संशोधन विधेयक को लोकसभा के सोमवार के एजेंडे में शामिल नहीं किया गया है। इसके बाद राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज है कि सरकार इस विधेयक पर फिलहाल धीमी चाल चलकर द्रमुक (DMK) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) यानी NCP (SP) जैसे दलों को साधने की कोशिश कर रही है।
दरअसल, परिसीमन के प्रस्तावित कदम के लिए सरकार को व्यापक राजनीतिक समर्थन की जरूरत है। DMK और NCP (SP) दोनों ही FCRA विधेयक के कुछ प्रावधानों का विरोध कर रहे हैं, लेकिन परिसीमन के मुद्दे पर इन दलों को संभावित सहयोगी के तौर पर देखा जा रहा है। ऐसे में सरकार और विपक्षी दलों के बीच विधायी मुद्दों को लेकर बातचीत की गुंजाइश बनी हुई है।
FCRA संशोधन विधेयक को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है। कांग्रेस ने इसे लेकर सरकार के खिलाफ मुखर रुख अपनाया है। पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कहा है कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल विधेयक का पुरजोर विरोध करेंगे। विपक्ष का आरोप है कि प्रस्तावित बदलाव विदेशी फंड प्राप्त करने वाले गैर-सरकारी संगठनों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकते हैं।
NCP (SP) की सांसद सुप्रिया सुले भी विधेयक को लेकर सरकार से इसे वापस लेने या संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजने की मांग कर चुकी हैं। उनका कहना है कि विधेयक पर सभी राजनीतिक दलों के साथ विस्तार से चर्चा होनी चाहिए।
वहीं, DMK अध्यक्ष एमके स्टालिन ने भी FCRA संशोधन विधेयक को लेकर आपत्ति जताई है और केंद्र से इसे वापस लेने अथवा मौजूदा कानून की व्यापक समीक्षा करने की मांग की है।
ऐसे में सरकार के सामने दोहरी चुनौती है—एक ओर FCRA विधेयक पर विपक्ष के विरोध का सामना करना और दूसरी ओर परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर क्षेत्रीय दलों का समर्थन हासिल करना। संसद के शेष दिनों में दोनों मुद्दों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां और बातचीत तेज होने के आसार हैं।





