नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि भारत में शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (नेट एफडीआई) में आई गिरावट का प्रमुख कारण भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशों में बढ़ता निवेश है। सरकार का कहना है कि यह स्थिति देश की आर्थिक कमजोरी नहीं, बल्कि भारतीय उद्योगों की वैश्विक स्तर पर बढ़ती क्षमता और विस्तार की महत्वाकांक्षा को दर्शाती हैलोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में सरकार ने बताया कि भारतीय कंपनियां अब विदेशी बाजारों में रणनीतिक परिसंपत्तियों का अधिग्रहण, नई तकनीक हासिल करने और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बढ़ाने के उद्देश्य से अधिक निवेश कर रही हैं। इसी वजह से ओवरसीज डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (ODI) में वृद्धि हुई है, जिसका असर नेट एफडीआई के आंकड़ों पर दिखाई दे रहा है।
सरकार के अनुसार, सकल एफडीआई (ग्रॉस एफडीआई) प्रवाह मजबूत बना हुआ है और भारत विदेशी निवेशकों के लिए एक आकर्षक निवेश गंतव्य बना हुआ है। हालांकि भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशों में अधिक पूंजी निवेश किए जाने से शुद्ध एफडीआई में कमी दर्ज हुई है। इसे भारतीय उद्योगों के वैश्विक विस्तार और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता में वृद्धि के रूप में देखा जाना चाहिए।
सरकार ने कहा कि भारतीय कंपनियां ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, विनिर्माण, फार्मा और अन्य क्षेत्रों में वैश्विक अवसरों का लाभ उठा रही हैं। विदेशों में निवेश से उन्हें नए बाजार, आधुनिक तकनीक और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं तक पहुंच मिल रही है, जिससे दीर्घकाल में भारतीय अर्थव्यवस्था को भी लाभ होगा।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि किसी देश की कंपनियों का विदेशों में निवेश बढ़ना उसकी आर्थिक परिपक्वता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बढ़ती भागीदारी का संकेत होता है। सरकार का भी कहना है कि भारतीय कंपनियों का अंतरराष्ट्रीय विस्तार देश की आर्थिक शक्ति और वैश्विक उपस्थिति को मजबूत करेगा तथा भविष्य में निवेश और रोजगार के नए अवसर पैदा करेगा।





