जयपुर। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्याय तभी सार्थक माना जाएगा, जब समाज के अंतिम व्यक्ति तक उसकी समान पहुंच सुनिश्चित हो। उन्होंने कहा कि समावेशी न्याय प्रणाली ही स्थायी शांति और सामाजिक विश्वास की आधारशिला है।
कॉमनवेल्थ पीस मेडिएशन कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए सीजेआई ने कहा कि मध्यस्थता (मेडिएशन) केवल विवाद निपटाने का माध्यम नहीं, बल्कि संवाद, सहमति और सामाजिक सौहार्द को मजबूत करने का प्रभावी साधन है। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में पंचायत और सामुदायिक संवाद की समृद्ध विरासत रही है, जहां सभी पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर मिलता था। आधुनिक न्याय प्रणाली में भी इसी भावना को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि पहले यह धारणा थी कि मध्यस्थता से न्यायपालिका की भूमिका कमजोर होगी, लेकिन अब यह सोच अप्रासंगिक हो चुकी है। आज दुनिया भर में यह स्वीकार किया जा रहा है कि मध्यस्थता न्यायालयों पर बढ़ते बोझ को कम करने के साथ-साथ लोगों को त्वरित, सुलभ और सौहार्दपूर्ण समाधान उपलब्ध कराती है।
उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल कानूनी विवादों का निपटारा करना नहीं, बल्कि लोगों के बीच विश्वास कायम रखना भी है। इसलिए ऐसी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए, जिसमें किसी भी पक्ष की आवाज दबे नहीं और सभी को समान अवसर मिले।
कार्यक्रम में केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने भी मध्यस्थता को न्याय प्रणाली का महत्वपूर्ण स्तंभ बताते हुए कहा कि भारत इसे संस्थागत रूप देने की दिशा में लगातार कदम बढ़ा रहा है। उन्होंने विश्वास जताया कि ऐसे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन वैश्विक स्तर पर वैकल्पिक विवाद समाधान प्रणाली को नई दिशा देंगे।
सम्मेलन में विभिन्न देशों के न्यायविद, मध्यस्थ, विधि विशेषज्ञ और नीति निर्माता शामिल हुए। इस दौरान न्याय प्रणाली को अधिक प्रभावी, सुलभ और जनोन्मुख बनाने के लिए मध्यस्थता की भूमिका पर विस्तृत चर्चा की गई।





