बीजिंग: चीन ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट (चीन में माउंट चोमोलुंगमा) के पास हाई-एल्टीट्यूड ड्रोन अनुसंधान और विकास केंद्र शुरू किया है। इस केंद्र का उद्देश्य अत्यधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ड्रोन तकनीक की क्षमता को विकसित करना और आपातकालीन सहायता, पर्वतारोहण तथा पर्यावरण निगरानी जैसे क्षेत्रों में इसके इस्तेमाल को बढ़ावा देना है।
चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में स्थापित यह केंद्र कम ऑक्सीजन, तेज हवाओं और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाले इलाकों में ड्रोन की कार्यक्षमता का परीक्षण करेगा। विशेषज्ञों के अनुसार, इतनी अधिक ऊंचाई पर ड्रोन संचालन बड़ी तकनीकी चुनौती होती है, क्योंकि कम वायु घनत्व और मौसम की अनिश्चितता उपकरणों की क्षमता को प्रभावित करती है।
इस केंद्र में बड़े आकार के मानवरहित हवाई उपकरणों (UAV) के परीक्षण, उड़ान डेटा संग्रह और नई तकनीकों के विकास पर काम किया जाएगा। चीन पहले ही एवरेस्ट क्षेत्र में ड्रोन के जरिए सामान पहुंचाने, मैपिंग और पर्यावरण संबंधी कार्यों के प्रयोग कर चुका है।
हाई-एल्टीट्यूड ड्रोन का इस्तेमाल पर्वतारोहियों तक जरूरी सामान पहुंचाने, आपदा के समय बचाव अभियान में सहायता करने और ग्लेशियरों की निगरानी जैसे कार्यों में किया जा सकता है। चीन की ड्रोन निर्माता कंपनियों ने एवरेस्ट क्षेत्र में ऑक्सीजन सिलेंडर और अन्य सामग्री पहुंचाने के परीक्षण भी किए हैं।
माउंट एवरेस्ट क्षेत्र रणनीतिक और वैज्ञानिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण माना जाता है। चीन का यह कदम ऐसे समय में सामने आया है, जब दुनिया के कई देश ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ड्रोन तकनीक के इस्तेमाल पर तेजी से काम कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के शोध केंद्र भविष्य में पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों में लॉजिस्टिक्स, आपदा प्रबंधन और वैज्ञानिक अभियानों को आसान बनाने में मदद कर सकते हैं। हालांकि, ऊंचाई वाले इलाकों में ड्रोन संचालन के लिए मौसम, सुरक्षा और पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर चुनौतियां बनी रहेंगी।





