नई दिल्ली। फ्रांस के एवीआँ–ले–बैं में आयोजित G7 शिखर सम्मेलन के दौरान एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि क्या दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन को इस समूह से बाहर रखना एक रणनीतिक भूल है। सम्मेलन में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समेत G7 देशों के प्रमुख वैश्विक आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं, लेकिन चीन की अनुपस्थिति को लेकर विशेषज्ञों ने गंभीर सवाल उठाए हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि जिस समय वैश्विक अर्थव्यवस्था और व्यापार पर चीन का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है, उस समय उसे G7 जैसे मंच से बाहर रखना समूह की प्रासंगिकता पर प्रश्न खड़ा करता है। चीन आज वैश्विक सप्लाई चेन, तकनीकी विकास, और पर्यावरण नीतियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, ऐसे में उसके बिना किसी भी बड़े वैश्विक फैसले की प्रभावशीलता सीमित रह सकती है।
हालांकि, G7 देशों का मानना है कि यह समूह लोकतांत्रिक और समान मूल्यों वाले देशों का मंच है, जबकि चीन की राजनीतिक व्यवस्था इस ढांचे से अलग है। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि चीन को शामिल करने से समूह के भीतर नीतिगत सहमति बनाना और कठिन हो सकता है, जिससे G7 की एकजुटता प्रभावित हो सकती है।
कुछ विश्लेषकों ने रूस के उदाहरण का हवाला देते हुए कहा कि यदि चीन को शामिल करने की कोशिश की जाती है, तो इससे वही स्थिति उत्पन्न हो सकती है जैसी पहले रूस के साथ देखी गई थी, जब यूक्रेन संकट के बाद उसे समूह से बाहर कर दिया गया था।
इसी बीच, G7 एजेंडे में वैश्विक आर्थिक असंतुलन, यूक्रेन युद्ध, ईरान से जुड़े हालात और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकी चुनौतियां प्रमुख हैं। लेकिन चीन की अनुपस्थिति इन सभी मुद्दों पर व्यापक वैश्विक सहमति बनाने में एक बड़ी बाधा के रूप में देखी जा रही है।
कुल मिलाकर, विशेषज्ञों के अनुसार G7 को अपनी भूमिका और प्रभावशीलता बनाए रखने के लिए यह तय करना होगा कि वह पुराने ढांचे पर कायम रहेगा या बदलते वैश्विक परिदृश्य में चीन जैसे बड़े आर्थिक शक्ति केंद्रों को भी साथ लेने पर विचार करेगा।





