काबुल: अफगानिस्तान में तालिबान सरकार ने रूस के साथ अपना पहला औपचारिक सैन्य सहयोग समझौता किया है। यह समझौता रक्षा और सुरक्षा क्षेत्र में दोनों देशों के बीच सहयोग को मजबूत करने के मकसद से किया गया है। जानकारी के अनुसार, इस समझौते में सैन्य प्रशिक्षण, हथियार आपूर्ति और खुफिया सहयोग जैसे अहम पहलू शामिल हैं।
समझौते में पाकिस्तान भी भागीदार के रूप में जुड़ा है, जो क्षेत्रीय सुरक्षा और आतंकवाद निरोधक उपायों में तालिबान और रूस की गतिविधियों का समर्थन करेगा। यह कदम अफगानिस्तान में बढ़ते सुरक्षा खतरों और वैश्विक सुरक्षा समीकरणों को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह समझौता तालिबान के अंतरराष्ट्रीय मान्यता की दिशा में पहला औपचारिक कदम भी माना जा सकता है। रूस के लिए यह अफगानिस्तान में अपनी रणनीतिक भूमिका बढ़ाने और क्षेत्रीय प्रभाव सुनिश्चित करने का अवसर है। वहीं, तालिबान के लिए यह तकनीकी और सैन्य सहयोग के जरिए अपने शासन को स्थिर करने में मददगार साबित हो सकता है।
रूस और पाकिस्तान दोनों ने तालिबान के साथ इस समझौते के तहत साझा हितों और सुरक्षा लक्ष्यों पर सहमति जताई है। इससे अफगानिस्तान में सुरक्षा ढांचे को सुदृढ़ करने, सीमा सुरक्षा को मजबूत करने और आतंकवादी गतिविधियों पर नियंत्रण पाने में मदद मिलेगी।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस समझौते की प्रतिक्रिया मिश्रित रही है। कुछ विशेषज्ञ इसे अफगानिस्तान में स्थिरता लाने की दिशा में सकारात्मक कदम मान रहे हैं, जबकि अन्य इसे क्षेत्रीय तनाव और शक्तियों के टकराव के नए आयाम जोड़ने वाला भी मान रहे हैं।
तालिबान नेतृत्व ने कहा है कि यह समझौता पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों और देश की सुरक्षा के लिए है। उन्होंने रूस और पाकिस्तान के साथ सहयोग को अफगानिस्तान की सुरक्षा और विकास के लिए महत्वपूर्ण बताया।
इस समझौते के साथ ही अफगानिस्तान ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह वैश्विक और क्षेत्रीय शक्तियों के साथ सामरिक साझेदारी को बढ़ावा देने की दिशा में कदम उठा रहा है।





