देहरादून: उत्तराखंड के वन्य जीव संरक्षण की चिंता बढ़ती जा रही है। राज्य के जंगलों में बाघ और तेंदुए अब सुरक्षित नहीं माने जा रहे हैं। वन विभाग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में 345 बाघ और तेंदुओं की मौत दर्ज की गई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इन मौतों के पीछे वन्यजीवों का आवास खत्म होना, सड़क और रेल पटरियों पर दुर्घटनाएँ, और कभी-कभी शिकार की घटनाएँ मुख्य कारण हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जंगलों में इंसानी गतिविधियों के बढ़ते दबाव के कारण वन्य जीवों की संख्या घट सकती है, अगर तुरंत ठोस कदम नहीं उठाए गए।
वन्यजीव प्रेमी और एनजीओ इस स्थिति को गंभीर मान रहे हैं। उनका कहना है कि जंगलों में बाघ और तेंदुए की सुरक्षा के लिए अधिक सतर्कता, गश्ती बढ़ाना और स्थानीय लोगों में जागरूकता जरूरी है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया है कि जंगलों में जंगली जानवरों के मार्ग और सुरक्षित आवास क्षेत्र सुनिश्चित किए जाएँ।
वन विभाग ने यह भी बताया कि जंगलों में अतिक्रमण रोकने, अवैध शिकार पर नकेल कसने और सड़क पार करने के सुरक्षित मार्ग बनाने की दिशा में कई प्रयास किए जा रहे हैं। इसके अलावा, राज्य सरकार ने वन्य जीव संरक्षण के लिए नई नीतियाँ और योजनाएँ लागू करने की तैयारी की है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर वन्य जीवों की सुरक्षा में देरी होती है, तो इसका असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ेगा। बाघ और तेंदुए जैसे शीर्ष शिकारी न केवल जंगल के संतुलन के लिए जरूरी हैं, बल्कि पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।
इस रिपोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जंगलों की सुरक्षा सिर्फ वन विभाग का कार्य नहीं, बल्कि सामुदायिक भागीदारी और सतत संरक्षण प्रयास से ही संभव है।





