पेरिस/नई दिल्ली: विश्व की सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्थाओं के समूह ‘G7’ के विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान फ्रांस से एक बड़ी कूटनीतिक खबर सामने आई है। बैठक के व्यस्त कार्यक्रम के बीच, भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के बीच एक विशेष मुलाकात हुई। इस मुलाकात को वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और भारत-फ्रांस के प्रगाढ़ होते रक्षा एवं सामरिक संबंधों के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी का मैत्री संदेश लेकर पहुँचे जयशंकर
बैठक की औपचारिक शुरुआत में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने राष्ट्रपति मैक्रों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं और गहरी मित्रता का संदेश प्रेषित किया। यह संदेश दोनों देशों के बीच शीर्ष स्तर पर मौजूद आपसी विश्वास और गर्मजोशी को दर्शाता है। भारतीय विदेश मंत्री की इस विशेष मुलाकात ने न केवल द्विपक्षीय संबंधों को नई मजबूती प्रदान की, बल्कि भविष्य के सामरिक रोडमैप (Strategic Roadmap) की एक स्पष्ट झलक भी पेश की है।
वैश्विक तनाव और साझा हितों पर गंभीर चर्चा
फ्रांस में आयोजित इस उच्च-स्तरीय बैठक के दौरान दोनों नेताओं ने वर्तमान में चल रहे विभिन्न वैश्विक संघर्षों और तनावपूर्ण स्थितियों पर विस्तार से चर्चा की। सूत्रों के अनुसार, बातचीत का मुख्य केंद्र यूक्रेन संकट, हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में स्थिरता और आतंकवाद जैसे ज्वलंत मुद्दे रहे। जयशंकर और मैक्रों ने इस बात पर सहमति जताई कि वैश्विक शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए समान विचारधारा वाले देशों का एक साथ आना समय की मांग है।
रक्षा और सामरिक संबंधों को नई धार
भारतीय विदेश मंत्री और फ्रांसीसी राष्ट्रपति की इस मुलाकात के बाद यह संकेत मिले हैं कि आने वाले समय में दोनों देश रक्षा उत्पादन, अंतरिक्ष तकनीक और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में अपने सहयोग को और अधिक विस्तार देंगे। फ्रांस, जो भारत का एक प्रमुख रक्षा भागीदार रहा है, ने ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत आधुनिक तकनीक के हस्तांतरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।
कूटनीतिक गलियारों में हलचल
विशेषज्ञों का मानना है कि G7 समूह का स्थायी सदस्य न होने के बावजूद, भारत की इस स्तर पर सक्रियता और राष्ट्रपति मैक्रों के साथ यह विशेष वार्ता विश्व पटल पर भारत के बढ़ते प्रभाव और कद को प्रमाणित करती है। यह मुलाकात दर्शाती है कि वैश्विक समस्याओं के समाधान में भारत की भूमिका अब अपरिहार्य हो चुकी है।





