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उत्तराखंड: हाथी सुरक्षा दीवार निर्माण अधर में, 1960 से पुराने राजस्व रिकॉर्ड लापता; एनजीटी में वन विभाग का हलफनामा

देहरादून (23 मार्च, 2026): उत्तराखंड के कोटद्वार इलाके में इंसानों और हाथियों के बीच संघर्ष को रोकने के लिए प्रस्तावित एक महत्वपूर्ण हाथी सुरक्षा दीवार (Elephant Proof Wall) का निर्माण कार्य प्रशासनिक पेचीदगियों के कारण अधर में लटक गया है। लाल ढांग रेंज में सिम्बलखाल से सिडकुल तक बनने वाली 1402 मीटर लंबी यह दीवार अब सरकारी फाइलों में गुम होकर रह गई है। इस मामले में एक चौंकाने वाला खुलासा तब हुआ जब वन विभाग ने राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT) को सूचित किया कि संबंधित भूमि के मालिकाना हक का निर्धारण करने के लिए आवश्यक सन 1960 से पुराने राजस्व मानचित्र और अभिलेख सरकारी अभिलेखागार से लापता हैं। इस गंभीर लापरवाही के कारण दीवार निर्माण के लिए आवश्यक भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया ठप पड़ी हुई है।

एनजीटी का निर्देश: हाथी सुरक्षा दीवार निर्माण में तेजी लाएं

क्षेत्र में हाथियों के आबादी वाले इलाकों में घुसने और फसलों व जान-माल को नुकसान पहुँचाने की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए, एनजीटी ने साल 2024 में हाथी सुरक्षा दीवार के निर्माण में तेजी लाने के स्पष्ट निर्देश दिए थे। एनजीटी का उद्देश्य इस दीवार के जरिए मानव-हाथी संघर्ष को कम करना और दोनों के लिए एक सुरक्षित वातावरण तैयार करना था। लेकिन, वन विभाग और राजस्व विभाग के बीच समन्वय की कमी और अभिलेखों के अभाव ने इस महत्वपूर्ण परियोजना को खटाई में डाल दिया है।

वन और राजस्व विभाग के रिकॉर्ड में फर्क: जमीन का मालिक कौन?

हाथी सुरक्षा दीवार के निर्माण के लिए चिन्हित भूमि के मालिकाना हक को लेकर वन विभाग और राजस्व विभाग के रिकॉर्ड में महत्वपूर्ण अंतर पाया गया है:

  1. मालिकाना हक का विवाद: वन विभाग का दावा है कि चिन्हित भूमि का एक बड़ा हिस्सा वन भूमि है, जबकि राजस्व विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार यह भूमि राजस्व भूमि या निजी स्वामित्व वाली हो सकती है। इस विरोधाभास के कारण यह साफ नहीं हो पा रहा है कि उस जमीन का असल में मालिकाना हक किसका है।
  2. अभिलेखों की तलाश: एनजीटी के निर्देश पर, वन विभाग और राजस्व विभाग ने संयुक्त रूप से विवादित क्षेत्र से संबंधित पुराने राजस्व रिकॉर्ड और मानचित्रों की तलाश शुरू की। इस तलाश का उद्देश्य भूमि के मूल स्वामित्व का पता लगाना था, ताकि दीवार निर्माण के लिए आवश्यक भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सके।

चौंकाने वाला खुलासा: 1960 से पुराने रिकॉर्ड लापता

जमीन के असली मालिक की तलाश के दौरान एक अत्यंत गंभीर और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया:

  • लापता रिकॉर्ड: वन विभाग ने एनजीटी में दाखिल एक शपथ पत्र (Halafnama) में स्वीकार किया है कि विवादित क्षेत्र से संबंधित सन 1960 से पुराने राजस्व मानचित्र और अभिलेख सरकारी अभिलेखागार में कहीं भी नहीं मिल रहे हैं।
  • भरसक प्रयास: विभाग ने दावा किया कि उसने इन रिकॉर्डों को तलाशने के भरसक प्रयास किए, लेकिन उसे कोई सफलता नहीं मिली। इस कारण भूमि के स्वामित्व का निर्धारण करना असंभव हो गया है और दीवार निर्माण की प्रक्रिया रुक गई है।

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