कोलंबो (20 मार्च, 2026): पश्चिम एशिया में गहराते सैन्य संकट और ईरान-इजराइल के बीच जारी महायुद्ध के बीच श्रीलंका ने अपनी तटस्थ विदेश नीति पर अडिग रहने का बड़ा फैसला लिया है। श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने संसद में घोषणा की है कि उनकी सरकार ने अमेरिकी वायुसेना के लड़ाकू विमानों को अपने हवाई क्षेत्र का उपयोग करने या लैंडिंग की अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया है। श्रीलंका के इस कड़े रुख को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका के सैन्य दखल के खिलाफ एक बड़े कूटनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
मत्तला एयरपोर्ट पर लैंडिंग की थी कोशिश: राष्ट्रपति का खुलासा
संसद में एक महत्वपूर्ण चर्चा के दौरान राष्ट्रपति दिसानायके ने इस घटनाक्रम की विस्तृत जानकारी साझा की:
- मार्च की घटना: राष्ट्रपति ने बताया कि मार्च की शुरुआत में दो अमेरिकी लड़ाकू विमानों ने श्रीलंका के मत्तला राजपक्षे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे (MRIA) पर उतरने की अनुमति मांगी थी।
- सीधा इनकार: श्रीलंका सरकार ने अमेरिकी अनुरोध को तत्काल प्रभाव से ठुकरा दिया। राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि श्रीलंका अपनी धरती या हवाई क्षेत्र का उपयोग किसी भी देश की युद्ध गतिविधियों या सैन्य अभियानों के लिए नहीं होने देगा।
तटस्थता का संकल्प: ‘युद्ध की जिद’ में शामिल नहीं होगा श्रीलंका
राष्ट्रपति दिसानायके ने अपनी सरकार के इस फैसले के पीछे की मंशा को स्पष्ट करते हुए कहा:
- शांति का समर्थन: श्रीलंका पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को लेकर चिंतित है, लेकिन वह किसी भी सैन्य गुट का हिस्सा बनकर अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं करेगा।
- क्षेत्रीय स्थिरता: सरकार का मानना है कि विदेशी लड़ाकू विमानों को लैंडिंग की अनुमति देना श्रीलंका को अनचाहे विवादों में घसीट सकता है, जिसका असर देश की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
- स्वतंत्र विदेश नीति: दिसानायके प्रशासन ने यह साफ कर दिया है कि वे ‘किसी के पक्ष’ में होने के बजाय ‘शांति के पक्ष’ में हैं।
कूटनीतिक असर: अमेरिका-श्रीलंका संबंधों पर प्रभाव?
श्रीलंका के इस साहसिक कदम के दूरगामी कूटनीतिक परिणाम हो सकते हैं:
- चीन और भारत की नजर: हिंद महासागर में श्रीलंका की रणनीतिक स्थिति बहुत महत्वपूर्ण है। अमेरिका को इनकार करने से यह संदेश गया है कि कोलंबो अब किसी महाशक्ति के दबाव में काम नहीं करेगा।
ग्लोबल साउथ की आवाज: श्रीलंका का यह रुख कई अन्य विकासशील देशों के लिए मिसाल बन सकता है जो पश्चिमी देशों के सैन्य अभियानों में शामिल होने से बच रहे हैं।





