Monday, February 23, 2026

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देवभूमि में बूंद-बूंद को तरसते ग्रामीण: कई गांवों तक नहीं पहुँच रहा पानी; दूषित जल के भरोसे हजारों परिवार, बीमारियों का खतरा बढ़ा

देहरादून/पौड़ी: एक ओर जहाँ सरकार ‘हर घर नल, हर घर जल’ योजना के जरिए शत-प्रतिशत कवरेज का दावा कर रही है, वहीं उत्तराखंड के सुदूरवर्ती पहाड़ी इलाकों से जल संकट की डरावनी तस्वीरें सामने आ रही हैं। राज्य के कई जिलों में आज भी हजारों परिवार पाइपलाइन और नलों के होने के बावजूद पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कई गांवों में सप्लाई ठप होने के कारण ग्रामीण असुरक्षित प्राकृतिक स्रोतों और गधेरों (बरसाती नालों) का दूषित जल पीने को मजबूर हैं, जिससे सीमावर्ती और पहाड़ी क्षेत्रों में जलजनित बीमारियों (Water-borne diseases) का खतरा तेजी से मंडराने लगा है।

सूखते हलक और ठप पड़ी योजनाएं: धरातल की हकीकत

विभिन्न जनपदों से मिली रिपोर्ट के अनुसार, पेयजल किल्लत की स्थिति अब विकराल रूप ले चुकी है:

  • सूखी पाइपलाइनें: पौड़ी, टिहरी और अल्मोड़ा के कई गांवों में जल जीवन मिशन के तहत पाइप तो बिछा दिए गए हैं, लेकिन उनमें महीनों से पानी नहीं आया है। ग्रामीणों का आरोप है कि केवल कागजों पर लक्ष्य पूरा करने के लिए आनन-फानन में कनेक्शन दिए गए।
  • प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भरता: मुख्य सप्लाई न होने के कारण महिलाएं और बच्चे मीलों पैदल चलकर गधेरों और पुराने नौलों (बावड़ियों) से पानी लाने को विवश हैं।
  • पशुओं के लिए भी संकट: केवल इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि मवेशियों के लिए भी पानी जुटाना एक बड़ी चुनौती बन गया है, जिससे पशुपालन पर निर्भर ग्रामीणों की आजीविका प्रभावित हो रही है।

मजबूरी में पी रहे हैं दूषित जल

पानी की कमी ने ग्रामीणों को स्वास्थ्य के साथ समझौता करने पर मजबूर कर दिया है:

  1. असुरक्षित जल स्रोत: ग्रामीण खुले नालों और गड्ढों में जमा पानी को छानकर इस्तेमाल कर रहे हैं। इस पानी में मिट्टी, बैक्टीरिया और अन्य अशुद्धियां होने की पूरी आशंका है।
  2. बीमारियों का प्रकोप: दूषित जल के सेवन से गांवों में पेट दर्द, डायरिया (दस्त), और त्वचा संबंधी रोगों के मामले बढ़ रहे हैं। स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों पर मरीजों की संख्या में इजाफा देखा गया है।
  3. फिल्ट्रेशन का अभाव: अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में जल शोधन (Water Purification) की कोई व्यवस्था नहीं है, जिससे सीधे प्राकृतिक स्रोतों का पानी पीना जानलेवा साबित हो सकता है।

प्रशासनिक उदासीनता और भौगोलिक चुनौतियां

जल संकट के पीछे केवल प्रकृति ही नहीं, बल्कि कुछ प्रशासनिक कारण भी जिम्मेदार माने जा रहे हैं:

  • मेंटेनेंस की कमी: पहाड़ों में भूस्खलन के कारण अक्सर पाइपलाइनें टूट जाती हैं, जिन्हें ठीक करने में जल संस्थान हफ्तों लगा देता है।
  • घटता जल स्तर: ग्लोबल वार्मिंग और जंगलों के दोहन के कारण पारंपरिक जल स्रोत (धारे और नौले) तेजी से सूख रहे हैं।
  • बजट का अभाव: कई अधूरी पेयजल योजनाओं के लिए बजट की कमी का हवाला देकर काम बीच में ही रोक दिया गया है।

ग्रामीणों का आक्रोश: “वोट बहिष्कार की चेतावनी”

कई गांवों के लोगों ने सरकार और प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि जल्द ही उनकी पेयजल समस्या का स्थायी समाधान नहीं किया गया, तो वे आगामी स्थानीय चुनावों का बहिष्कार करेंगे और सड़कों पर उतरकर उग्र आंदोलन करेंगे।

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