वॉशिंगटन/न्यूयॉर्क: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी संभावित कानूनी हार को लेकर एक बार फिर सार्वजनिक रूप से अपनी हताशा व्यक्त की है। सुप्रीम कोर्ट में होने वाली एक निर्णायक सुनवाई से पहले ट्रंप ने भावुक अपील करते हुए कहा कि यदि फैसला उनके खिलाफ आता है, तो “हम पूरी तरह बर्बाद हो जाएंगे।” ट्रंप को डर है कि अदालत उनके खिलाफ चल रहे धोखाधड़ी और चुनावी हस्तक्षेप के मामलों में ऐसा फैसला सुना सकती है जो न केवल उनकी संपत्ति को खतरे में डाल देगा, बल्कि उनकी राजनीतिक वैधता पर भी सवाल खड़े कर देगा। ट्रंप ने इस पूरी कानूनी प्रक्रिया को अपने खिलाफ ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ करार दिया है।
किस फैसले का सता रहा है डर? (मुख्य विवाद)
ट्रंप की घबराहट के पीछे तीन प्रमुख कानूनी मोर्चे हैं जो सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन हैं:
- संपत्ति की कुर्की और भारी जुर्माना: न्यूयॉर्क के सिविल धोखाधड़ी मामले में उन पर करीब 450 मिलियन डॉलर से अधिक का जुर्माना है। यदि सुप्रीम कोर्ट उनकी अपील खारिज करता है, तो उन्हें यह भारी राशि तुरंत चुकानी होगी या उनकी प्रमुख संपत्तियां (जैसे ट्रंप टॉवर) जब्त की जा सकती हैं।
- राष्ट्रपति की ‘इम्युनिटी’ (छूट) का मुद्दा: सबसे महत्वपूर्ण सुनवाई इस बात पर है कि क्या राष्ट्रपति रहते हुए किए गए कार्यों के लिए उन पर आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है। यदि अदालत ने इस ‘कवच’ को हटा दिया, तो उन पर जेल जाने का खतरा मंडराने लगेगा।
- चुनाव लड़ने की योग्यता: कुछ याचिकाओं में संविधान के ‘विद्रोह खंड’ (Insurrection Clause) का हवाला देते हुए उन्हें पद के लिए अयोग्य घोषित करने की मांग की गई है।
‘हम बर्बाद हो जाएंगे’ – ट्रंप की दलील का मतलब
ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर और वकीलों के माध्यम से यह संदेश दिया है कि यह लड़ाई केवल उनकी नहीं है:
- आर्थिक पतन: ट्रंप का तर्क है कि भारी जुर्माना उनके व्यावसायिक साम्राज्य को खत्म कर देगा, जिसे उन्होंने दशकों में खड़ा किया है।
- लोकतंत्र पर प्रहार: उन्होंने दावा किया कि जनता द्वारा चुने गए राष्ट्रपति को कानूनी दांव-पेंच में फंसाना अमेरिकी लोकतंत्र की हत्या करने जैसा है।
- समर्थकों को संदेश: ‘हम’ शब्द का इस्तेमाल कर ट्रंप अपने समर्थकों को यह अहसास दिलाना चाहते हैं कि यह हमला पूरे रिपब्लिकन आंदोलन पर है।
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका और विशेषज्ञों की राय
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में वर्तमान में रूढ़िवादी न्यायाधीशों का बहुमत है, जिनमें से तीन की नियुक्ति खुद ट्रंप ने की थी। इसके बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि:
- कानून का शासन: अदालत संविधान की व्याख्या के आधार पर फैसला लेगी, न कि राजनीतिक निष्ठा के आधार पर।
- ऐतिहासिक मिसाल: यह फैसला अमेरिका के इतिहास में राष्ट्रपति की शक्तियों और जवाबदेही की नई सीमाएं तय करेगा।
20 जनवरी को होने वाले शपथ ग्रहण समारोह से पहले सुप्रीम कोर्ट का कोई भी प्रतिकूल आदेश ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत को विवादों और कानूनी बाधाओं से भर सकता है। यही कारण है कि दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बनने जा रहे ट्रंप इस समय अपनी कानूनी टीम के साथ दिन-रात एक कर रहे हैं ताकि इस ‘अस्तित्व के संकट’ से बचा जा सके।





