Friday, March 6, 2026

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85 साल बाद पटना में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक: बिहार चुनाव से पहले क्या है सियासी मायने?

पटना। विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू होते ही कांग्रेस ने बड़ा दांव खेला है। 85 साल बाद बुधवार को पार्टी की सर्वोच्च नीति निर्धारण इकाई कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) की बैठक पटना में हुई। बैठक में पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और सोनिया गांधी समेत तमाम वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। बिहार में यह बैठक ऐसे समय पर हुई है, जब राज्य में चुनावी सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं।

ऐतिहासिक महत्व और चुनावी संदेश

1940 के बाद यह पहला मौका है जब बिहार में CWC की बैठक हुई। उस दौर में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्वतंत्रता संग्राम की कई निर्णायक लड़ाइयों की नींव यहीं से रखी थी। बैठक का आयोजन सदाकत आश्रम में हुआ, जो कभी बिहार की कांग्रेस राजनीति का सत्ता केंद्र माना जाता था।
विशेषज्ञ मानते हैं कि कांग्रेस इस बैठक के जरिए अपने ऐतिहासिक संघर्षों को वर्तमान चुनावी जंग से जोड़ने की कोशिश कर रही है। चुनावी राज्यों में CWC बैठक कराने की रणनीति कांग्रेस पहले भी अपना चुकी है। 2023 में तेलंगाना विधानसभा चुनाव से ठीक पहले वहां हुई बैठक के बाद पार्टी को अप्रत्याशित सफलता मिली थी। कांग्रेस बिहार में भी ऐसे ही नतीजों की उम्मीद कर रही है।

2020 में कांग्रेस का प्रदर्शन

पिछले विधानसभा चुनाव (2020) में कांग्रेस ने राजद के साथ गठबंधन कर 70 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन केवल 19 सीटें ही जीत पाई। उसका स्ट्राइक रेट करीब 27% रहा, जो राजद (52%), भाकपा माले (63.15%) और माकपा (50%) जैसे सहयोगियों से काफी कम था। यही वजह है कि इस बार सीट बंटवारे को लेकर महागठबंधन में खींचतान है।
कांग्रेस 70 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है, लेकिन राजद पिछली परफॉर्मेंस का हवाला देकर उसे 50-55 सीटों तक सीमित करने के पक्ष में है। स्थिति और जटिल इसलिए हो गई है क्योंकि इस बार झामुमो, वीआईपी और पशुपति पारस की रालोजपा भी गठबंधन में शामिल हो चुके हैं।

राहुल गांधी की ‘वोटर अधिकार यात्रा’

कांग्रेस ने बिहार में सक्रियता बढ़ाने के लिए राहुल गांधी की 16 दिवसीय वोटर अधिकार यात्रा निकाली। 16 अगस्त से शुरू हुई इस यात्रा ने 25 जिलों की 183 विधानसभा सीटों को कवर किया। सासाराम से शुरू हुई यह यात्रा पटना, भागलपुर, पूर्णिया, दरभंगा, गया और चंपारण जैसे बड़े इलाकों से गुजरी।
इस यात्रा में महागठबंधन के प्रमुख नेता तेजस्वी यादव और वीआईपी के मुकेश सहनी समेत कई सहयोगी दलों के नेता भी शामिल हुए। इसके अलावा द्रमुक प्रमुख व तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन और शिवसेना (उद्धव) के संजय राउत जैसे बाहरी नेता भी राहुल के साथ मंच साझा करते दिखे।
कांग्रेस ने इस यात्रा को भाजपा पर वोट चोरी’ का आरोप लगाने के मंच के रूप में इस्तेमाल किया। नारा दिया गया—“वोट चोर, गद्दी छोड़।” हालांकि यात्रा के दौरान कुछ विवाद भी हुए, जिनमें पीएम मोदी की मां को लेकर दिए गए विवादित बयान ने सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरीं।

बिहार में कांग्रेस का ट्रैक रिकॉर्ड

आजादी के बाद लंबे समय तक बिहार पर कांग्रेस का दबदबा रहा।

  • 1947-1967: कांग्रेस ने लगातार चुनाव जीते और राज्य को चार मुख्यमंत्री दिए।
  • 1972: बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की और 324 में से 167 सीटें जीतीं।
  • 1977: जनता पार्टी की आंधी में कांग्रेस 57 सीटों पर सिमट गई।
  • 1980: इंदिरा गांधी की वापसी के साथ कांग्रेस ने 169 सीटें जीतीं।
  • 1985: कांग्रेस ने 196 सीटें जीतकर आखिरी बार बड़ा बहुमत हासिल किया। इसके बाद से पार्टी का ग्राफ गिरता गया।
  • 1990 के बाद: कांग्रेस का कोई मुख्यमंत्री बिहार में नहीं बना। पार्टी कभी सहयोगी दलों के सहारे सत्ता में रही, लेकिन अपने दम पर सरकार बनाने में नाकाम रही।

चुनावी मायने

85 साल बाद पटना में हुई CWC बैठक कांग्रेस के लिए एक प्रतीकात्मक और रणनीतिक कदम है। पार्टी अपने पुराने जनाधार को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रही है। राहुल गांधी की यात्रा और सक्रियता के जरिए कांग्रेस यह संदेश देना चाहती है कि वह बिहार की राजनीति में फिर से दावेदारी पेश कर रही है। हालांकि, सीट बंटवारे और कमजोर संगठनात्मक ढांचे के कारण उसके सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं।

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