न्यूयॉर्क/जिनेवा।
संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के मंच पर इंडोनेशियाई राष्ट्रपति ने अपने संबोधन का अंत एक अनोखे और ध्यान आकर्षित करने वाले अंदाज में किया। उन्होंने ‘ओम शांति, शांति ओम’ का जाप करके महासभा को एक संदेश दिया—शांति और सद्भाव की महत्ता को सबके सामने रखा।
अनोखा संदेश
राष्ट्रपति ने अपने भाषण में वैश्विक चुनौतियों, आर्थिक असमानता और पर्यावरण संकट पर भी प्रकाश डाला। लेकिन उनका भाषण का सबसे यादगार हिस्सा रहा सार्वभौमिक शांति का संदेश, जिसे उन्होंने ‘ओम’ के मंत्र के साथ व्यक्त किया।
“हम सबके लिए शांति केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि एक अनिवार्य मार्ग है। इसी संदेश को साझा करते हुए मैं कहना चाहता हूं—ओम शांति, शांति ओम।”
वैश्विक नेताओं की प्रतिक्रिया
उनके इस संदेश को महासभा में मौजूद कई देशों के प्रतिनिधियों ने ताली और सराहना से स्वीकार किया। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संकेत राजनीतिक संवाद और वैश्विक कूटनीति में नवीनता लाता है।
पृष्ठभूमि
इंडोनेशिया, जो विश्व के सबसे बड़े मुस्लिम बहुल देश में से एक है, अक्सर अपने वैश्विक कूटनीतिक मंच पर सांस्कृतिक और धार्मिक सहिष्णुता का संदेश देता रहा है। इस बार UNGA में ‘ओम’ का प्रयोग उनके संदेश को सार्वभौमिक और धर्म-निरपेक्ष बनाने का प्रयास माना जा रहा है।
संदेश की अहमियत
विशेषज्ञों के अनुसार, महासभा जैसे मंच पर इस तरह के संदेश—जो सांस्कृतिक प्रतीक और वैश्विक शांति का संदेश हों—देशों के बीच संवाद, समझ और सहयोग को प्रोत्साहित करते हैं।
अंतरराष्ट्रीय विमर्श में जोड़
राष्ट्रपति का यह अंदाज सिर्फ एक आध्यात्मिक संकेत नहीं था, बल्कि यह मानवाधिकार, पर्यावरण संरक्षण और वैश्विक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भी ध्यान आकर्षित करने की कोशिश था।





