Wednesday, March 4, 2026

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सदन की गरिमा से समझौता हुआ तो भुगतने पड़े भयंकर परिणाम : अमित शाह

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि संसद और विधानसभाएं बहस और चर्चा के मंच हैं, लेकिन यदि इन्हें संकीर्ण राजनीतिक लाभ के लिए बाधित किया जाता है, तो इसके परिणाम गंभीर होते हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में स्वस्थ बहस आवश्यक है, लेकिन विपक्ष के नाम पर सदन को चलने से रोकना राष्ट्रहित में ठीक नहीं है।
शाह ने यह टिप्पणी अखिल भारतीय सभापति सम्मेलन को संबोधित करते हुए की। उन्होंने कहा कि हाल ही में संपन्न मानसून सत्र में विपक्ष के लगातार विरोध के चलते संसद की कार्यवाही कई बार बाधित हुई और इसका असर राष्ट्र निर्माण पर पड़ा।
गृह मंत्री ने कहा, “लोकतंत्र में बहस होनी ही चाहिए। लेकिन किसी के संकीर्ण राजनीतिक लाभ के लिए सदन को चलने न देना ठीक नहीं है। इस पर देश, जनता और निर्वाचित प्रतिनिधियों को विचार करना होगा।”
उन्होंने जोर दिया कि सदन की चर्चाओं में हमेशा सार्थकता होनी चाहिए और सभी प्रतिनिधियों को अध्यक्ष पद की गरिमा और सम्मान बढ़ाने की दिशा में काम करना चाहिए।
लोकतंत्र की जड़ों पर चर्चा

अमित शाह ने भारत की लोकतांत्रिक परंपरा की सराहना करते हुए कहा कि आजादी के बाद से देश में सत्ता परिवर्तन शांतिपूर्ण ढंग से हुआ है। उन्होंने कहा, “भारत में लोकतंत्र की जड़ें इतनी गहरी हैं कि सत्ता परिवर्तन के दौरान खून की एक बूंद भी नहीं गिरी। जबकि दुनिया के कई देशों में लोकतंत्र की स्थिति लगातार बिगड़ रही है।”
विट्ठलभाई पटेल को श्रद्धांजलि
गृह मंत्री ने अपने संबोधन में संसद के पहले निर्वाचित भारतीय अध्यक्ष विट्ठलभाई पटेल को भी श्रद्धांजलि दी। उन्होंने याद दिलाया कि “100 साल पहले आज ही के दिन, महान स्वतंत्रता सेनानी विट्ठलभाई पटेल को लोकसभा का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। यही भारत के विधायी इतिहास की शुरुआत थी।”
शाह ने कहा कि जिस प्रकार स्वतंत्रता संग्राम ने भारत को आजादी दिलाई, उसी प्रकार लोकतंत्र की स्थापना और विधायी प्रक्रियाओं की मजबूती भी उतनी ही महत्वपूर्ण कार्य था। विट्ठलभाई पटेल ने कठिन परिस्थितियों में भी लोकतांत्रिक संस्थाओं की नींव रखने और उन्हें सशक्त बनाने में अहम भूमिका निभाई।

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