Saturday, March 7, 2026

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IIT गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने ब्लैकहोल के एक्स-रे सिग्नल को किया डिकोड

गुवाहाटी। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के यूआर राव सेटेलाइट सेंटर और इजरायल के हाइफा विश्वविद्यालय के सहयोग से ब्लैकहोल से उत्सर्जित रहस्यमय एक्स-रे सिग्नल पैटर्न को सफलतापूर्वक डिकोड किया है। यह अध्ययन धरती से करीब 28 हजार प्रकाश वर्ष दूर स्थित ब्लैकहोल जीआरएस 1915+105 पर आधारित है।

यह शोध भारत की अंतरिक्ष वेधशाला एस्ट्रोसेट से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर किया गया। वैज्ञानिकों ने पाया कि ब्लैकहोल से निकलने वाली एक्स-रे चमक (लाइट) दो चरणों में बदलती रहती है—एक तेज (ब्राइट) और दूसरा मंद (डिम)। ब्राइट चरण में कोरोना (ब्लैकहोल के चारों ओर गर्म गैसों की परत) अत्यधिक गर्म हो जाता है और झिलमिलाहट स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जबकि डिम चरण में कोरोना ठंडा होकर फैल जाता है और यह झिलमिलाहट समाप्त हो जाती है।

इस खोज के निष्कर्ष प्रतिष्ठित पत्रिका मंथली नोटिसेज ऑफ द रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी’ में प्रकाशित किए गए हैं।

दुनियाभर में हो रहा अध्ययन

वैज्ञानिक लंबे समय से ब्लैकहोल के रहस्यों को समझने का प्रयास कर रहे हैं। जब ब्लैकहोल अपने आसपास के तारों की बाहरी परतों से गैस खींचता है, तो अत्यधिक ताप और एक्स-रे उत्पन्न होते हैं। इन्हीं का अध्ययन कर खगोल विज्ञानी ब्लैकहोल के आस-पास के वातावरण और आकाशगंगा पर इसके प्रभावों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी जुटाते हैं।

कोरोना की भूमिका पर नई रोशनी

आईआईटी गुवाहाटी के भौतिकी विभाग के प्रोफेसर एस. दास ने बताया—
हमें तेज एक्स-रे झिलमिलाहट (फ्लिकरिंग) के पहले ठोस साक्ष्य मिले हैं। यह दर्शाता है कि ब्लैकहोल का कोरोना स्थायी संरचना नहीं है, बल्कि इसका आकार और ऊर्जा लगातार बदलते रहते हैं।”

इसरो के यूआरएससी के अनुज नंदी के अनुसार—
हमारा अध्ययन इस झिलमिलाहट की उत्पत्ति के प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करता है। यह साबित करता है कि कोरोना में होने वाले बदलाव ही इन एक्स-रे सिग्नलों की वजह हैं।”

ब्लैकहोल और आकाशगंगा के विकास का संबंध

विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज न केवल ब्लैकहोल की प्रकृति को समझने में मदद करेगी, बल्कि यह भी बताएगी कि ब्लैकहोल किस तरह पूरी आकाशगंगाओं के विकास को प्रभावित कर सकते हैं

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