नई दिल्ली। भारतीय वायुसेना का बहुउद्देशीय परिवहन विमान AN-32 एक बार फिर सुर्खियों में है। असम के जोरहाट एयरबेस पर AN-32 विमान दुर्घटना में पांच वायुसेना कर्मियों की मौत के बाद इस विमान की भूमिका और सुरक्षा को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
साल 1984 में भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया AN-32 पिछले चार दशकों से देश के सबसे कठिन और दुर्गम इलाकों में सेना की जीवनरेखा बना हुआ है। यह विमान विशेष रूप से ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों और गर्म मौसम में उड़ान भरने के लिए डिजाइन किया गया था। लद्दाख, सियाचिन, अरुणाचल प्रदेश और अंडमान-निकोबार जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में सैनिकों, हथियारों और राहत सामग्री पहुंचाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार AN-32 को भारतीय वायुसेना के ट्रांसपोर्ट बेड़े की “रीढ़” माना जाता है। यह विमान पैराड्रॉपिंग, आपदा राहत, चिकित्सा निकासी और विशेष अभियानों में लगातार इस्तेमाल होता रहा है।
वायुसेना ने समय-समय पर इस विमान के आधुनिकीकरण और तकनीकी उन्नयन का कार्य भी किया। 2009 के बाद शुरू हुए अपग्रेड कार्यक्रम के तहत इसके एवियोनिक्स, नेविगेशन सिस्टम और संरचनात्मक मजबूती को बढ़ाया गया, जिससे इसकी सेवा अवधि 40 वर्ष तक बढ़ाई जा सके।
हालांकि, बेड़े की बढ़ती उम्र को लेकर चिंताएं भी लगातार सामने आती रही हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय से सेवा दे रहे इन विमानों के स्थान पर नए मध्यम परिवहन विमानों की आवश्यकता महसूस की जा रही है। इसी दिशा में भारतीय वायुसेना अपने ट्रांसपोर्ट बेड़े के आधुनिकीकरण की योजना पर काम कर रही है।
जोरहाट हादसे के बाद वायुसेना ने दुर्घटना के कारणों की जांच के लिए कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी के आदेश दिए हैं। अधिकारियों का कहना है कि जांच रिपोर्ट आने के बाद ही हादसे के वास्तविक कारणों का पता चल सकेगा।
AN-32 ने चार दशकों तक देश की रक्षा तैयारियों में अहम योगदान दिया है और आज भी कठिन इलाकों में सेना की आपूर्ति व्यवस्था का प्रमुख आधार बना हुआ है।





