नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में चौबीसों घंटे न्यायिक राहत उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने ऐसे मामलों की नियमित न्यायालय समय के बाद भी सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार करने की मांग वाली याचिका पर विचार करने की सहमति जताई है।
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में देश के सभी उच्च न्यायालयों को नोटिस जारी कर उनकी राय मांगी है। याचिका में कहा गया है कि कई बार देर रात गिरफ्तारी, अवैध हिरासत, मकान गिराने की कार्रवाई, निर्वासन अथवा मौलिक अधिकारों के उल्लंघन जैसे मामलों में तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है, लेकिन अदालतों के नियमित समय के बाद राहत मिलने में कठिनाई आती है।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल ने सुझाव दिया कि इस संबंध में एसओपी तैयार करने का कार्य न्यायालय के प्रशासनिक स्तर पर किया जाना अधिक उपयुक्त होगा। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी चिंता जताई कि 24 घंटे न्यायालय की व्यवस्था का दुरुपयोग न हो और इसका लाभ केवल वास्तविक आपात एवं अत्यावश्यक मामलों तक ही सीमित रहे।
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि न्याय तक समयबद्ध पहुंच संविधान के मूल सिद्धांतों का हिस्सा है। इसलिए ऐसी व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता है, जिससे जीवन और स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में अवकाश या कार्यालय समय समाप्त होने के बाद भी जरूरतमंद व्यक्ति अदालत का दरवाजा खटखटा सके।
अब इस मामले में उच्च न्यायालयों से प्राप्त सुझावों और जवाबों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट आगे की कार्यवाही करेगा। यदि एसओपी लागू होती है तो देश में आपात न्यायिक सुनवाई की व्यवस्था अधिक व्यवस्थित और प्रभावी बन सकती है।





