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12 साल में बैंकों ने 9.95 लाख करोड़ रुपये के कॉरपोरेट कर्ज किए राइट-ऑफ

नई दिल्ली। देश के बैंकों ने पिछले 12 वर्षों में करीब 9.95 लाख करोड़ रुपये के कॉरपोरेट कर्ज राइट-ऑफ किए हैं। यह जानकारी संसद में सरकार की ओर से दी गई है। आंकड़ों ने बैंकिंग क्षेत्र में बड़े कर्जदारों से जुड़े फंसे हुए ऋण और उनकी वसूली को लेकर एक बार फिर बहस छेड़ दी है।

सरकार के अनुसार, कर्ज राइट-ऑफ का अर्थ कर्ज माफ करना नहीं है। यह बैंकों की बैलेंस शीट को दुरुस्त करने की एक लेखांकन प्रक्रिया है। राइट-ऑफ किए गए कर्ज की वसूली का अधिकार बैंकों के पास बना रहता है और संबंधित उधारकर्ता की देनदारी समाप्त नहीं होती। बैंक विभिन्न कानूनी माध्यमों से इन रकमों की वसूली जारी रखते हैं।

उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, बड़े उद्योग और सेवा क्षेत्र लंबे समय तक बैंकिंग क्षेत्र के राइट-ऑफ में प्रमुख हिस्सेदार रहे हैं। वित्त वर्ष 2022-23 में अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों ने करीब 2.09 लाख करोड़ रुपये के कर्ज राइट-ऑफ किए थे, जिसमें बड़े उद्योग और सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी आधे से अधिक थी।

बैंकों की ओर से कर्ज राइट-ऑफ किए जाने के बावजूद वसूली की प्रक्रिया जारी रहती है। इसके लिए दिवाला एवं दिवालियापन संहिता (IBC), ऋण वसूली न्यायाधिकरण (DRT), सरफेसी कानून और अन्य कानूनी प्रावधानों का इस्तेमाल किया जाता है।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि राइट-ऑफ का उद्देश्य बैंकों की वित्तीय स्थिति को अधिक वास्तविक रूप में प्रस्तुत करना है। हालांकि, इतने बड़े पैमाने पर कॉरपोरेट कर्ज के राइट-ऑफ से बैंकों की वसूली क्षमता और बड़े कर्जदारों के प्रति जवाबदेही को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

बैंकिंग क्षेत्र में बढ़ते राइट-ऑफ के बीच हाल के वर्षों में कर्ज के दबाव का स्वरूप भी बदला है। उपलब्ध आंकड़ों में खुदरा ऋणों के राइट-ऑफ में बढ़ोतरी दिखाई दे रही है, जबकि पहले बड़े कॉरपोरेट खातों से जुड़े खराब ऋण प्रमुख चिंता रहे थे।

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