नई दिल्ली/अबू धाबी।
मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य की सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए एक वैकल्पिक रास्ता मजबूत करने की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ाया है। दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा मार्गों में शामिल हॉर्मुज़ पर निर्भरता कम करने के लिए यूएई अब पाइपलाइन नेटवर्क के जरिए सीधे अरब सागर तक तेल पहुँचाने की रणनीति पर काम कर रहा है।
हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से प्रतिदिन लगभग 20 मिलियन बैरल तेल गुजरता है, जो वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का लगभग एक चौथाई हिस्सा है। ऐसे में किसी भी सैन्य तनाव, हमले या अवरोध की स्थिति पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति और तेल कीमतों को प्रभावित कर सकती है।
इसी जोखिम को कम करने के लिए यूएई ने अबू धाबी के तेल क्षेत्रों से पूर्वी तट स्थित फुजैराह बंदरगाह तक जाने वाली अबू धाबी क्रूड ऑयल पाइपलाइन (ADCOP) को अपनी रणनीति का केंद्र बनाया है। करीब 380–406 किलोमीटर लंबी यह पाइपलाइन तेल को सीधे ओमान की खाड़ी तक पहुँचाती है, जिससे जहाज़ों को हॉर्मुज़ से होकर गुजरने की आवश्यकता नहीं रहती।
इस पाइपलाइन की मौजूदा क्षमता लगभग 1.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन है, जिसे भविष्य में बढ़ाकर लगभग 1.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक ले जाने की योजना है। इससे यूएई अपने कुल तेल निर्यात का बड़ा हिस्सा सुरक्षित वैकल्पिक मार्ग से भेज सकेगा।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम केवल व्यापारिक नहीं बल्कि रणनीतिक भी है। फारस की खाड़ी में तनाव बढ़ने, ड्रोन हमलों और समुद्री सुरक्षा जोखिमों ने तेल उत्पादक देशों को वैकल्पिक निर्यात मार्ग विकसित करने के लिए प्रेरित किया है। इसी कारण सऊदी अरब और यूएई दोनों पाइपलाइन आधारित निर्यात व्यवस्था को मजबूत कर रहे हैं ताकि समुद्री chokepoint पर निर्भरता घटाई जा सके।
फुजैराह बंदरगाह इस नई रणनीति का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है, जहाँ विशाल भंडारण सुविधाएँ और ऑफशोर लोडिंग सिस्टम विकसित किए गए हैं। यह बंदरगाह सीधे खुले समुद्र से जुड़ा है और एशिया, यूरोप तथा भारत जैसे बड़े आयातकों तक तेज़ आपूर्ति सुनिश्चित करता है।
विश्लेषकों के अनुसार यूएई की यह पहल वैश्विक ऊर्जा भू-राजनीति में बदलाव का संकेत है। यदि हॉर्मुज़ क्षेत्र में तनाव बढ़ता है तो पाइपलाइन आधारित निर्यात मॉडल भविष्य में तेल आपूर्ति का नया मानक बन सकता है। भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों के लिए भी यह व्यवस्था सप्लाई सुरक्षा और मूल्य स्थिरता की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
कुल मिलाकर, यूएई का यह कदम केवल एक तकनीकी समाधान नहीं बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री रणनीति और वैश्विक शक्ति संतुलन से जुड़ा दीर्घकालिक भू-राजनीतिक संदेश माना जा रहा है।





