नई दिल्ली। हिमालय क्षेत्र में होने वाली बर्फबारी अब तक के वैश्विक मौसम आंकड़ों के अनुमान से कहीं अधिक हो रही है। एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि मौजूदा वैश्विक मौसम मॉडल हिमालय के दुर्गम पर्वतीय इलाकों में होने वाली वास्तविक बर्फबारी का सही आकलन नहीं कर पा रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे जल संसाधन, ग्लेशियरों और जलवायु परिवर्तन से जुड़े आकलनों पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
अध्ययन के अनुसार, हिमालय के कई ऊंचे और दुर्गम क्षेत्रों में वास्तविक हिमपात वैश्विक डेटासेट में दर्ज आंकड़ों से काफी अधिक है। इसकी मुख्य वजह जटिल पर्वतीय भू-आकृति है, जिसके कारण उपग्रह आधारित और वैश्विक मौसम मॉडल सटीक जानकारी जुटाने में सक्षम नहीं हो पाते। ऐसे में क्षेत्रीय स्तर पर किए गए प्रत्यक्ष अवलोकन अधिक विश्वसनीय साबित हुए हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि हिमालय एशिया की प्रमुख नदियों का स्रोत है और करोड़ों लोगों की पेयजल, सिंचाई तथा ऊर्जा आवश्यकताएं इसी पर निर्भर हैं। यदि बर्फबारी के आंकड़ों का सही आकलन नहीं होगा तो जल उपलब्धता, ग्लेशियरों के पिघलने की गति और भविष्य की जलवायु संबंधी भविष्यवाणियों में भी त्रुटियां आ सकती हैं।
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि हिमालयी क्षेत्रों में स्थानीय मौसम निगरानी नेटवर्क को मजबूत करने और अधिक उन्नत तकनीकों का उपयोग करने की आवश्यकता है। इससे बर्फबारी के अधिक सटीक आंकड़े उपलब्ध होंगे और जल संसाधन प्रबंधन के साथ-साथ प्राकृतिक आपदाओं के पूर्वानुमान को भी बेहतर बनाया जा सकेगा।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अध्ययन हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र और जलवायु अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा। इससे भविष्य में जल सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से निपटने की रणनीतियां अधिक प्रभावी ढंग से तैयार की जा सकेंगी।





