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वैश्विक संकट के बीच यूएन महासभा को संबोधित करेंगे जयशंकर, 26 सितंबर को रखेंगे भारत का पक्ष

नई दिल्ली: विदेश मंत्री एस. जयशंकर 26 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के उच्चस्तरीय सत्र को संबोधित करेंगे। इस वर्ष महासभा की बैठक ऐसे समय हो रही है, जब दुनिया कई भू-राजनीतिक संघर्षों, ऊर्जा संकट, आपूर्ति श्रृंखला में बाधाओं और आर्थिक अनिश्चितताओं से जूझ रही है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा का 81वां सत्र औपचारिक रूप से 8 सितंबर से शुरू होगा, जबकि उच्चस्तरीय आम बहस 22 से 28 सितंबर तक चलेगी। संशोधित वक्ताओं की सूची में जयशंकर का नाम 26 सितंबर के दोपहर के सत्र के लिए शामिल किया गया है। वह पिछले वर्ष भी संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत का राष्ट्रीय वक्तव्य दे चुके हैं।

युद्ध और वैश्विक आर्थिक संकट पर रहेगा फोकस

इस बार महासभा ऐसे दौर में हो रही है, जब विभिन्न क्षेत्रों में जारी संघर्षों का असर खाद्य और ऊर्जा बाजारों पर पड़ रहा है। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में आपूर्ति संबंधी व्यवधानों ने भी वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और महंगाई को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं। ऐसे में जयशंकर के संबोधन में भारत की प्राथमिकताओं और वैश्विक चुनौतियों पर रुख महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भारत लगातार संवाद और कूटनीति के जरिए संघर्षों के समाधान पर जोर देता रहा है। हाल ही में यूक्रेन दौरे के बाद जयशंकर ने कहा कि भारत रूस और यूक्रेन दोनों के संपर्क में है और युद्ध को समाप्त करने में मददगार विचारों और सुझावों की तलाश कर रहा है।

ग्लोबल साउथ की आवाज उठाएगा भारत

यूएन महासभा में भारत ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला, जलवायु परिवर्तन तथा विकासशील देशों की चिंताओं जैसे मुद्दों को प्रमुखता दे सकता है। भारत लंबे समय से ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने और बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार की मांग करता रहा है।

इस महासभा सत्र का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि यह संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के दूसरे कार्यकाल का अंतिम महासभा सत्र होगा। उनका कार्यकाल दिसंबर में समाप्त होने वाला है। इस बीच नए महासचिव के चयन की प्रक्रिया भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी हुई है।

महासभा में जलवायु कार्रवाई, समुद्र के बढ़ते जलस्तर, महामारी से निपटने की तैयारी और परमाणु हथियारों के उन्मूलन जैसे मुद्दों पर भी चर्चा होगी। ऐसे व्यापक वैश्विक एजेंडे के बीच जयशंकर का संबोधन भारत की कूटनीतिक प्राथमिकताओं को दुनिया के सामने रखने का महत्वपूर्ण अवसर होगा।

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