नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) देश में प्लास्टिक यानी पॉलीमर मुद्रा नोटों को प्रचलन में लाने की दिशा में फिर से गंभीरता से विचार कर रहा है। बढ़ती नकदी मांग, नोटों की छपाई पर बढ़ता खर्च और खराब हो जाने वाले कागजी नोटों की समस्या को देखते हुए केंद्रीय बैंक जल्द ही पायलट प्रोजेक्ट शुरू कर सकता है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हाल ही में आरबीआई की बोर्ड बैठकों में पॉलीमर नोटों को लेकर चर्चा हुई है। बताया जा रहा है कि नकदी की बढ़ती जरूरत के बावजूद डिजिटल भुगतान के विस्तार के बीच नोटों की छपाई और रखरखाव पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ रहा है। आरबीआई की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में मुद्रा छपाई पर खर्च बढ़कर 6,372 करोड़ रुपये से अधिक पहुंच गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्लास्टिक नोट सामान्य कागजी नोटों की तुलना में अधिक टिकाऊ होते हैं। ये जल्दी फटते नहीं हैं, गंदे होने की संभावना कम रहती है और इनकी उम्र भी अधिक होती है। साथ ही इनमें उन्नत सुरक्षा फीचर्स शामिल किए जा सकते हैं, जिससे नकली नोटों की रोकथाम में मदद मिलेगी।
आरबीआई इससे पहले भी पॉलीमर नोटों को लेकर परीक्षण कर चुका है। वर्ष 2014 में 10 रुपये के पॉलीमर नोटों के फील्ड ट्रायल की योजना बनाई गई थी, लेकिन बाद में यह व्यापक स्तर पर लागू नहीं हो सकी। अब एक बार फिर इस प्रस्ताव को नए सिरे से आगे बढ़ाने की तैयारी चल रही है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक शुरुआती चरण में 10 और 20 रुपये जैसे कम मूल्यवर्ग के नोटों को परीक्षण के लिए चुना जा सकता है, क्योंकि इनका प्रचलन सबसे अधिक रहता है और ये जल्दी खराब हो जाते हैं। पायलट प्रोजेक्ट की सफलता के बाद ही बड़े स्तर पर प्लास्टिक नोटों के उपयोग पर फैसला लिया जाएगा।
दुनिया के कई देशों जैसे ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्रिटेन और सिंगापुर में पॉलीमर नोट पहले से उपयोग में हैं। इन देशों के अनुभवों के आधार पर भारत भी अपनी मुद्रा प्रणाली को अधिक टिकाऊ और सुरक्षित बनाने की दिशा में कदम बढ़ा सकता है।





