कोलकाता। इंटरनेट मीडिया पर न्यायाधीशों और अदालतों के खिलाफ बढ़ती आपत्तिजनक टिप्पणियों को लेकर कलकत्ता हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने कहा कि न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखना बेहद जरूरी है और सोशल मीडिया पर जजों के खिलाफ अभद्र या भ्रामक टिप्पणी स्वीकार नहीं की जा सकती।
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य पुलिस प्रशासन को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने यह भी पूछा कि न्यायाधीशों और अदालतों को निशाना बनाकर की जा रही टिप्पणियों को रोकने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सोशल मीडिया की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि कोई भी व्यक्ति न्यायपालिका की छवि खराब करने या न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास करे। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी गतिविधियां न्याय व्यवस्था में लोगों के विश्वास को कमजोर कर सकती हैं।
सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) को आवश्यक दिशा–निर्देश तैयार करने पर भी विचार करने को कहा। हाई कोर्ट ने संकेत दिए कि भविष्य में ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई की जा सकती है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के समय में इंटरनेट मीडिया पर न्यायाधीशों को लेकर बढ़ती व्यक्तिगत टिप्पणियों और अभियानों के कारण अदालतों की चिंता बढ़ी है। इसी को देखते हुए हाई कोर्ट ने यह सख्त रुख अपनाया है।
अदालत ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार है, लेकिन इसकी भी एक सीमा है। यदि कोई व्यक्ति या समूह न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश करता है तो यह अवमानना के दायरे में आ सकता है।
मामले की अगली सुनवाई जल्द होने की संभावना है। हाई कोर्ट के इस रुख को न्यायपालिका की गरिमा और स्वतंत्रता बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।






