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अंगदान में भारत पिछड़ा, केवल कुछ राज्यों तक सीमित है दान की रफ्तार

नई दिल्ली। देश में अंग प्रत्यारोपण की जरूरत लगातार बढ़ रही है, लेकिन अंगदान की स्थिति अभी भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। भारत में अंगदान का स्तर अपेक्षाकृत कम है और इसका बड़ा हिस्सा कुछ चुनिंदा राज्यों तक ही सीमित है। विशेषज्ञों के अनुसार, जागरूकता की कमी, सामाजिक भ्रांतियां और स्वास्थ्य ढांचे की असमान उपलब्धता इसके प्रमुख कारण हैं।

देश में प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में मरीज किडनी, लीवर, हृदय और अन्य अंगों के प्रत्यारोपण का इंतजार करते हैं। हालांकि, जरूरत के मुकाबले उपलब्ध अंगों की संख्या काफी कम है। स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, भारत में प्रत्यारोपण की संख्या बढ़ी है, लेकिन अंगदान की दर अभी भी कई विकसित देशों की तुलना में काफी पीछे है।

रिपोर्ट के मुताबिक, अंगदान में कुछ राज्यों का योगदान सबसे अधिक है, जबकि कई राज्यों में स्थिति बेहद कमजोर बनी हुई है। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना और केरल जैसे राज्यों में अंगदान और प्रत्यारोपण की व्यवस्था अपेक्षाकृत बेहतर है। वहीं, कई राज्यों में लोगों में जागरूकता और आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं की कमी के कारण अंगदान की गति धीमी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि मृत व्यक्ति के अंगदान (कैडेवर डोनेशन) को बढ़ावा देने के लिए लोगों में विश्वास और जागरूकता पैदा करना जरूरी है। कई बार परिवार भावनात्मक और सामाजिक कारणों से अंगदान का निर्णय नहीं ले पाते, जिससे जरूरतमंद मरीजों को समय पर अंग नहीं मिल पाता।

केंद्र सरकार अंगदान को बढ़ावा देने के लिए जागरूकता अभियान और बेहतर समन्वय व्यवस्था पर काम कर रही है। स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (NOTTO) के माध्यम से अंगदान प्रतिज्ञा और प्रत्यारोपण व्यवस्था को मजबूत करने के प्रयास किए जा रहे हैं। हाल के वर्षों में अंगदान प्रतिज्ञाओं की संख्या में भी वृद्धि दर्ज की गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अंगदान को केवल चिकित्सा विषय नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखने की जरूरत है। अस्पतालों में ब्रेन डेथ की पहचान, प्रशिक्षित कर्मियों की उपलब्धता और राज्यों के बीच बेहतर तालमेल से अंगदान की स्थिति में सुधार लाया जा सकता है।

स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकारों के अनुसार, भारत में अंग प्रत्यारोपण की क्षमता मौजूद है, लेकिन दानकर्ताओं की कमी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। यदि लोगों में जागरूकता बढ़े और सभी राज्यों में समान स्तर पर व्यवस्था विकसित हो, तो हजारों मरीजों को नई जिंदगी मिल सकती है।

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