नई दिल्ली। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने अपने छह लोकसभा सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को मंजूरी दिए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। पार्टी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के फैसले को चुनौती देते हुए इसे संविधान और दल-बदल कानून की भावना के विपरीत बताया है। मामले पर सर्वोच्च न्यायालय में जल्द सुनवाई होने की संभावना है।
याचिका में शिवसेना (यूबीटी) का कहना है कि लोकसभा अध्यक्ष द्वारा छह सांसदों के विलय को मान्यता देने का निर्णय कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है। पार्टी का तर्क है कि सांसदों के समूह को वैध विलय का लाभ तभी मिल सकता है, जब संबंधित राजनीतिक दल के संवैधानिक प्रावधानों और दल-बदल कानून की शर्तों का पूरी तरह पालन किया गया हो।
सुप्रीम कोर्ट में मामले का उल्लेख किए जाने पर भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत इस पर विचार करेगी। इसके बाद माना जा रहा है कि इस राजनीतिक रूप से अहम विवाद पर शीघ्र सुनवाई हो सकती है।
गौरतलब है कि हाल ही में लोकसभा अध्यक्ष ने शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे गुट में विलय को मंजूरी दी थी। इस फैसले के बाद लोकसभा में शिंदे गुट की संख्या बढ़ी है और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को भी संख्यात्मक मजबूती मिली है।
शिवसेना (यूबीटी) इस निर्णय को राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चुनौती दे रही है। पार्टी का कहना है कि अध्यक्ष का फैसला दल-बदल विरोधी कानून की मूल भावना के अनुरूप नहीं है और इससे निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के दलबदल को प्रोत्साहन मिल सकता है। दूसरी ओर, शिंदे गुट इस विलय को पूरी तरह वैध और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत किया गया कदम बता रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई पर सभी राजनीतिक दलों की नजरें टिकी हैं, क्योंकि इस मामले का फैसला न केवल महाराष्ट्र की राजनीति बल्कि संसद में दल-बदल से जुड़े मामलों की भविष्य की कानूनी व्याख्या पर भी असर डाल सकता है।





