नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के मान्यता प्राप्त मदरसों में कार्यरत 350 से अधिक शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियमित नियुक्ति और सरकारी अनुदान योजना के तहत वेतन भुगतान की मांग वाली याचिकाएं खारिज कर दी हैं। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता अपनी नियुक्तियों को वैध साबित करने में सफल नहीं रहे।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि संबंधित नियुक्तियां निर्धारित नियमों के अनुरूप नहीं पाई गईं। अदालत ने पश्चिम बंगाल मदरसा सेवा आयोग अधिनियम, 2008 से जुड़े विवाद और नियुक्तियों की वैधता की जांच के लिए गठित समिति की रिपोर्ट को बरकरार रखा।
मामले में 40 से अधिक याचिकाएं दायर की गई थीं, जिनमें 350 से अधिक शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों ने दावा किया था कि उनकी नियुक्तियां नियमित थीं और वे राज्य सरकार की ग्रांट-इन-एड योजना के तहत वेतन पाने के हकदार हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पहले कुछ चुनिंदा मामलों की जांच कर यह देखने का निर्देश दिया था कि क्या किसी कर्मचारी के साथ अन्याय हुआ है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने 13 याचिकाकर्ताओं के मामलों की विशेष रूप से समीक्षा की। पीठ ने पाया कि इनमें से कोई भी मामला ऐसा नहीं था, जिसके आधार पर राहत दी जा सके। इसके बाद अदालत ने सभी संबंधित याचिकाओं को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे लंबे समय से मदरसों में सेवाएं दे रहे हैं और उन्हें नियमित नियुक्ति का लाभ मिलना चाहिए। वहीं, समिति और राज्य पक्ष की ओर से नियुक्तियों की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल लंबे समय तक सेवा देने से नियुक्ति की वैधता स्वत: सिद्ध नहीं होती, बल्कि नियुक्ति प्रक्रिया का नियमों के अनुरूप होना आवश्यक है।
इस फैसले से पश्चिम बंगाल के उन मदरसा कर्मचारियों को राहत नहीं मिल सकी, जो सरकारी वेतन और नियमितीकरण की मांग कर रहे थे। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद अब उनके लिए सरकारी अनुदान योजना के तहत वेतन पाने का दावा समाप्त हो गया है।





