नई दिल्ली। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुए संयुक्त रक्षा समझौते की शर्तें सामने आने के बाद पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की रणनीतिक राजनीति में इसकी चर्चा तेज हो गई है। समझौते के तहत तीनों देशों को इसके लागू होने के बाद कम से कम 10 साल तक गठबंधन में बने रहना होगा। इसके बाद कोई देश इससे बाहर निकलना चाहता है, तो उसे कम से कम तीन महीने पहले लिखित सूचना देनी होगी।
मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर 7 अगस्त 2026 को हस्ताक्षर किए गए थे। इसमें तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ शामिल थे। समझौते में कुल 16 अनुच्छेद हैं, जिनमें सामूहिक रक्षा, सैन्य सहयोग और गठबंधन से बाहर निकलने की प्रक्रिया निर्धारित की गई है।
एक देश पर हमला, तो बाकी देंगे मदद
समझौते के अनुच्छेद-2 के अनुसार, यदि किसी सदस्य देश पर दूसरे देश या देशों के समूह की ओर से सशस्त्र हमला होता है, तो अन्य सदस्य उसकी सहायता करेंगे। इसमें सैन्य सहयोग समेत उपलब्ध संसाधनों के आधार पर आवश्यक कदम उठाने का प्रावधान है।
हालांकि, समझौते में यह तय नहीं किया गया है कि हर स्थिति में तीनों देशों को एक जैसी सैन्य कार्रवाई करनी होगी। सहायता का स्वरूप संबंधित देश की जरूरतों और सहयोगी देशों की सैन्य क्षमताओं के आकलन के बाद तय किया जाएगा।
10 साल की अवधि कब से होगी शुरू?
समझौते के अनुच्छेद-16 में स्पष्ट किया गया है कि 10 साल की अवधि हस्ताक्षर की तारीख से नहीं, बल्कि समझौते के अनुमोदन से जुड़े अंतिम दस्तावेज को संबंधित सचिवालय में जमा किए जाने के बाद शुरू होगी। इस अवधि के पूरा होने के बाद ही कोई सदस्य देश बाहर निकलने की प्रक्रिया शुरू कर सकेगा। इसके लिए उसे कूटनीतिक माध्यमों से तीन महीने पहले लिखित नोटिस देना होगा।
समझौते की कोई निश्चित समाप्ति तिथि नहीं है। किसी सदस्य के बाहर निकलने से पहले सहमत परियोजनाओं और गतिविधियों पर भी स्वतः रोक नहीं लगेगी। गोपनीय सूचनाओं की सुरक्षा से संबंधित जिम्मेदारियां भी जारी रहेंगी।
तुर्की की संसद में पहुंचा समझौता
तुर्की ने समझौते को संसद की मंजूरी के लिए प्रस्तुत कर दिया है। तीनों देशों के बीच सैन्य अभ्यास, खुफिया जानकारी साझा करने, रक्षा उद्योग और सैन्य साजो-सामान के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की भी योजना है।
सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों के मिसाइल और ड्रोन हमलों के बीच इस रक्षा साझेदारी का महत्व बढ़ गया है। हालांकि, वास्तविक संकट की स्थिति में गठबंधन किस स्तर तक सैन्य सहायता उपलब्ध कराएगा, यह संबंधित परिस्थितियों और उपलब्ध संसाधनों पर निर्भर करेगा।





