नई दिल्ली/वॉशिंगटन। वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ते दबाव और कच्चे तेल के घटते भंडार के बीच अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को लेकर कूटनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ जल्द से जल्द एक समझौते को अंतिम रूप देने की कोशिश में जुटे हैं, ताकि ऊर्जा संकट और तेल कीमतों में अस्थिरता को नियंत्रित किया जा सके।
रिपोर्ट्स के अनुसार, दुनिया भर में तेल और ईंधन के भंडार में कमी के चलते बाजारों में चिंता बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक बना रहा तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और अधिक प्रभावित हो सकती है और कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है।
अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि ईरान के साथ किसी समझौते से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिए तेल आपूर्ति सामान्य हो सकती है, जिससे वैश्विक बाजारों को स्थिरता मिलेगी। इसी कारण ट्रंप प्रशासन पर यह दबाव बढ़ गया है कि वह कूटनीतिक समाधान की दिशा में तेजी से कदम उठाए।
ऊर्जा विश्लेषकों के अनुसार, मौजूदा हालात में तेल उत्पादन और आपूर्ति दोनों पर दबाव है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था में महंगाई का जोखिम बढ़ रहा है। कई देशों की अर्थव्यवस्थाएं पहले ही ऊर्जा संकट की चुनौतियों का सामना कर रही हैं।
दूसरी ओर, ईरान के साथ वार्ता को लेकर भी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। हालांकि दोनों पक्षों के बीच बातचीत की संभावना बनी हुई है, लेकिन प्रमुख मुद्दों पर अब भी मतभेद बने हुए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच कोई ठोस समझौता होता है तो इससे न केवल मध्य पूर्व में तनाव कम होगा, बल्कि वैश्विक तेल बाजार को भी राहत मिल सकती है।
फिलहाल पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या यह कूटनीतिक प्रयास किसी ठोस समझौते में बदल पाएगा या फिर ऊर्जा संकट और गहरा होगा।




