देहरादून, 29 जून। उत्तराखंड के प्रसिद्ध तीर्थ एवं पर्यटन स्थल तुंगनाथ-चोपता क्षेत्र में प्लास्टिक प्रदूषण लगातार गंभीर रूप लेता जा रहा है। हिमालय की गोद में स्थित यह संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र अब प्लास्टिक कचरे की चपेट में आकर पर्यावरणीय संकट का सामना कर रहा है।
स्थानीय सूत्रों और पर्यावरणविदों के अनुसार, चोपता-तुंगनाथ ट्रेक रूट और आसपास के बुग्यालों में सिंगल यूज प्लास्टिक, पानी की बोतलें, खाद्य पैकेट और अन्य कचरा बड़ी मात्रा में बिखरा हुआ देखा जा रहा है। पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की बढ़ती आवाजाही के चलते यह समस्या और अधिक विकराल हो गई है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी बेहद नाजुक है और यहां जमा हो रहा प्लास्टिक कचरा धीरे-धीरे मिट्टी, जल स्रोतों और जैव विविधता को प्रभावित कर रहा है। कई स्थानों पर माइक्रोप्लास्टिक के खतरे की आशंका भी जताई जा रही है, जो लंबे समय में हिमालयी पारिस्थितिकी के लिए घातक साबित हो सकता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि सफाई व्यवस्था मौजूद होने के बावजूद जागरूकता की कमी और अनुशासनहीन पर्यटन के कारण स्थिति बिगड़ती जा रही है। ट्रेक मार्ग पर कई जगह कचरे के ढेर पर्यावरण की प्राकृतिक सुंदरता को भी प्रभावित कर रहे हैं।
इसी बीच पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने प्रशासन से सख्त कदम उठाने की मांग की है। उनका कहना है कि केवल सफाई अभियानों से समस्या का समाधान संभव नहीं है, बल्कि प्लास्टिक के उपयोग पर सख्त नियंत्रण और ‘जिम्मेदार पर्यटन’ को बढ़ावा देना आवश्यक है।
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि ट्रेकिंग रूट पर प्लास्टिक सामग्री के प्रवेश पर नियंत्रण, कचरा वापसी नीति (carry back policy) और स्थानीय स्तर पर वैकल्पिक पैकेजिंग व्यवस्था लागू की जानी चाहिए, ताकि इस क्षेत्र को बचाया जा सके।
गौरतलब है कि तुंगनाथ-चोपता क्षेत्र न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि यह देश-विदेश के पर्यटकों के लिए प्रमुख ट्रेकिंग और इको-टूरिज्म डेस्टिनेशन भी है। ऐसे में यहां बढ़ता प्रदूषण भविष्य में पर्यटन और पर्यावरण दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।





