अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping के बीच हालिया मुलाकात के बाद अमेरिका-चीन संबंधों में नरमी के संकेत दिखाई देने लगे हैं। बीजिंग में हुई वार्ता के दौरान दोनों नेताओं ने व्यापार, ताइवान, ईरान और वैश्विक स्थिरता जैसे मुद्दों पर चर्चा की। इस बदलते समीकरण को भारत के रणनीतिक हितों के नजरिये से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
रिपोर्टों के अनुसार ट्रंप ने शी जिनपिंग की नेतृत्व क्षमता की खुलकर सराहना की और दोनों देशों के बीच “स्थिर और रचनात्मक संबंध” बनाने की बात कही। विश्लेषकों का मानना है कि यदि वॉशिंगटन और बीजिंग के रिश्तों में तनाव कम होता है, तो इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की रणनीतिक भूमिका पर असर पड़ सकता है।
भारत पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका के साथ रक्षा, तकनीक और इंडो-पैसिफिक सहयोग को मजबूत करता रहा है। QUAD जैसे मंचों में भारत की भूमिका भी चीन को संतुलित करने की रणनीति का हिस्सा मानी जाती रही है। लेकिन अमेरिका-चीन संबंधों में संभावित सुधार से क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बदलने की आशंका जताई जा रही है।
बीजिंग वार्ता के दौरान ताइवान मुद्दा भी प्रमुख रहा। शी जिनपिंग ने अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा कि ताइवान मामले को गलत तरीके से संभालने पर टकराव की स्थिति बन सकती है। वहीं ट्रंप प्रशासन ने व्यापार और रणनीतिक सहयोग के बीच संतुलन बनाने के संकेत दिए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच अपनी “रणनीतिक स्वायत्तता” बनाए रखनी होगी। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती बातचीत से भारत के लिए अवसर और चुनौतियां दोनों पैदा हो सकती हैं। ऐसे में नई दिल्ली को अपनी विदेश नीति में संतुलन और क्षेत्रीय साझेदारियों को और मजबूत करने की जरूरत होगी।




