बेंगलुरु। कर्नाटक की राजनीति में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों के बीच उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के राज्य की कमान संभालने की संभावना तेज हो गई है। कांग्रेस नेतृत्व की ओर से अंतिम फैसला भले ही बाकी हो, लेकिन राजनीतिक गलियारों में उन्हें अगला मुख्यमंत्री माना जा रहा है। ऐसे में उनके सामने कई अहम राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौतियां होंगी।
सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस के सामाजिक समीकरण ‘अहिंदा’ (अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित) को मजबूत बनाए रखने की होगी। यह वर्ग पार्टी का प्रमुख वोट बैंक माना जाता है और इसकी नाराजगी सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है।
दूसरी चुनौती राज्य की आर्थिक स्थिति को संभालने की होगी। कांग्रेस सरकार की विभिन्न गारंटी योजनाओं पर भारी खर्च हो रहा है। ऐसे में विकास कार्यों और लोककल्याणकारी योजनाओं के बीच संतुलन बनाना नए नेतृत्व के लिए आसान नहीं होगा।
तीसरी चुनौती मंत्रिमंडल गठन और सत्ता संतुलन की रहेगी। मुख्यमंत्री पद में बदलाव के बाद कांग्रेस के भीतर विभिन्न गुटों और समुदायों की ओर से प्रतिनिधित्व की मांग तेज हो गई है। उपमुख्यमंत्री पदों, महत्वपूर्ण मंत्रालयों और संगठनात्मक जिम्मेदारियों को लेकर भी दबाव बढ़ सकता है।
चौथी चुनौती बेंगलुरु से बाहर विकास कार्यों को गति देने की होगी। राज्य के अन्य क्षेत्रों में आधारभूत ढांचे, रोजगार और निवेश को लेकर अपेक्षाएं बढ़ी हैं। सरकार को क्षेत्रीय असंतुलन दूर करने पर विशेष ध्यान देना होगा।
पांचवीं और सबसे संवेदनशील चुनौती मेकेदातु परियोजना तथा कावेरी जल विवाद से जुड़ी रहेगी। तमिलनाडु के साथ जल बंटवारे का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक और कानूनी विवाद का विषय रहा है। ऐसे में शिवकुमार को विकास और राजनीतिक संतुलन दोनों साधने होंगे।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि संगठनात्मक क्षमता और संकट प्रबंधन में माहिर माने जाने वाले डीके शिवकुमार के लिए मुख्यमंत्री पद तक पहुंचना जितना महत्वपूर्ण होगा, उससे कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण उनकी नई जिम्मेदारियों को सफलतापूर्वक निभाना होगा।





