देहरादून। उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार ने प्रदेश के पंजीकृत मदरसों में धार्मिक शिक्षा के पाठ्यक्रम को लेकर बड़ा बदलाव किया है। नए पाठ्यक्रम में नफरत, हिंसा और कट्टरता को बढ़ावा देने वाली शिक्षा पर रोक लगाई गई है। इसके स्थान पर प्रेम, सद्भाव और भाईचारे जैसे मूल्यों को प्राथमिकता दी गई है। सरकार का उद्देश्य विद्यार्थियों में सामाजिक समरसता और राष्ट्रसेवा की भावना को बढ़ावा देना है।
प्रदेश में मदरसा बोर्ड समाप्त किए जाने के बाद उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन किया गया था। अब इसी प्राधिकरण के माध्यम से मदरसों में शिक्षा के मानक निर्धारित किए जा रहे हैं। नई व्यवस्था के तहत आधुनिक शिक्षा के साथ धार्मिक शिक्षा के लिए भी निर्धारित पाठ्यक्रम का पालन करना होगा।
विद्वानों की मदद से तैयार हुआ पाठ्यक्रम
उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के अध्यक्ष प्रो. सुरजीत सिंह गांधी के अनुसार, इस्लामिक धार्मिक शिक्षा का पाठ्यक्रम विद्वान इस्लामिक विशेषज्ञों की मदद से तैयार किया गया है। इसमें ऐसी किसी भी शिक्षा को स्थान नहीं दिया गया है, जो नफरत, हिंसा, कट्टरता या कटुता को बढ़ावा दे।
प्राधिकरण ने पंजीकृत मदरसों में दोपहर के बाद धार्मिक शिक्षा देने का वैकल्पिक प्रावधान किया है। यानी धार्मिक शिक्षा के लिए निर्धारित व्यवस्था के तहत पाठ्यक्रम का पालन करना होगा।
हिंदी, गणित, विज्ञान और अंग्रेजी की पढ़ाई अनिवार्य
नई व्यवस्था के तहत पंजीकृत मदरसों में सुबह के समय राज्य सरकार द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार हिंदी, गणित, विज्ञान और अंग्रेजी सहित अन्य आधुनिक विषय पढ़ाना अनिवार्य होगा। मदरसों को मान्यता प्राप्त करने के लिए शिक्षा विभाग और अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के नियमों एवं शर्तों का पालन करना होगा।
अल्पसंख्यक विभाग के सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते के अनुसार, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सोच के अनुरूप धार्मिक शिक्षा का नया पाठ्यक्रम तैयार किया गया है।
नई पीढ़ी में सद्भाव बढ़ाने पर जोर
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि सरकार चाहती है कि देवभूमि उत्तराखंड में नई पीढ़ी प्रेम और सद्भाव के मूल्यों के साथ आगे बढ़े और राष्ट्रसेवा में योगदान दे। सरकार का मानना है कि आधुनिक शिक्षा और निर्धारित धार्मिक पाठ्यक्रम के माध्यम से विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक अवसर उपलब्ध कराए जा सकते हैं।





