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अरावली परामर्श प्रक्रिया पर एबीवीकेए के सवाल, ग्रामीणों की भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग

नई दिल्ली। अरावली पर्वतमाला की परिभाषा और सीमांकन को लेकर गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति की जन-परामर्श प्रक्रिया पर अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम (एबीवीकेए) ने सवाल उठाए हैं। संगठन का कहना है कि मौजूदा परामर्श प्रक्रिया में अरावली क्षेत्र के ग्रामीण और आदिवासी समुदायों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित नहीं हो पा रही है।

एबीवीकेए के अनुसार, समिति की ओर से सुझाव और आपत्तियां मुख्य रूप से ऑनलाइन माध्यम से मांगी जा रही हैं। ऐसे में दूरदराज के गांवों में रहने वाले उन लोगों के लिए अपनी बात समिति तक पहुंचाना मुश्किल है, जो डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल नहीं करते या तकनीकी रूप से सक्षम नहीं हैं। संगठन ने कहा कि अरावली से जुड़े फैसलों का सीधा असर स्थानीय समुदायों की आजीविका और पर्यावरण पर पड़ता है, इसलिए उनकी राय को प्रत्यक्ष रूप से सुनना जरूरी है।

संगठन ने समिति से ग्रामीण क्षेत्रों में मैदानी स्तर पर जन-सुनवाई और प्रत्यक्ष परामर्श कराने की मांग की है। इसके लिए पंचायत भवनों, सामुदायिक केंद्रों और अन्य स्थानीय संस्थानों के माध्यम से लोगों को प्रक्रिया की जानकारी देने का सुझाव दिया गया है। स्थानीय भाषाओं में सूचना प्रसारित करने और पारंपरिक माध्यमों के इस्तेमाल पर भी जोर दिया गया है।

पर्यावरण से जुड़े कार्यकर्ताओं ने भी 21 दिन की परामर्श अवधि को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात तक फैले अरावली क्षेत्र के विभिन्न समुदायों से सार्थक सुझाव जुटाने के लिए अधिक समय और व्यापक मैदानी प्रक्रिया की आवश्यकता है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की परिभाषा और सीमांकन से जुड़े विवाद की स्वतंत्र समीक्षा के लिए उच्चाधिकार प्राप्त विशेषज्ञ समिति गठित की है। समिति को वैज्ञानिक आधार पर पूरे मामले की समीक्षा कर रिपोर्ट सौंपनी है। अदालत ने इस प्रक्रिया में विशेषज्ञों और अन्य हितधारकों से परामर्श की आवश्यकता पर भी जोर दिया है।

अरावली की पारिस्थितिकी, खनन, वन क्षेत्र और स्थानीय समुदायों की आजीविका से जुड़े व्यापक प्रभावों को देखते हुए जन-परामर्श प्रक्रिया को लेकर उठे सवाल अब समिति के लिए अहम चुनौती बन गए हैं।

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