देहरादून। हिमालयी क्षेत्र में लगातार बढ़ रही आपदाओं और भू-धंसाव जैसी घटनाओं पर वैज्ञानिकों ने गहरी चिंता जताई है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर मौजूदा विकास मॉडल को बदला नहीं गया तो आने वाले वर्षों में हिमालय का संतुलन बुरी तरह बिगड़ सकता है। इसके गंभीर नतीजे पूरे उत्तराखंड समेत हिमालय से जुड़े अन्य राज्यों और पड़ोसी देशों तक महसूस किए जाएंगे।
वैज्ञानिकों ने स्पष्ट कहा है कि हिमालय की नाजुक भौगोलिक संरचना अंधाधुंध सड़क निर्माण, अनियंत्रित खनन, सुरंग परियोजनाओं और अनियोजित शहरीकरण का बोझ नहीं झेल सकती। हाल के वर्षों में बार-बार आई आपदाओं से यह साफ हो चुका है कि बिना वैज्ञानिक दृष्टिकोण के किए गए विकास कार्य सीधे तौर पर आपदा को न्योता दे रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि “ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन और स्थानीय स्तर पर गलत विकास नीतियां मिलकर हिमालय को अस्थिर बना रही हैं।” यदि यही स्थिति जारी रही तो आने वाले दशकों में न केवल पहाड़ी इलाकों में, बल्कि मैदानी क्षेत्रों तक में भी बड़ी आपदाओं का खतरा बढ़ जाएगा।
समाधान के रूप में वैज्ञानिकों ने सरकार को सलाह दी है कि पर्वतीय इलाकों में बड़े पैमाने पर अर्ली वार्निंग सिस्टम का जाल बिछाया जाए। उनका कहना है कि समय रहते अलर्ट मिल जाए तो जनहानि और संपत्ति के नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है। इसके अलावा सड़क, पुल और हाइड्रो प्रोजेक्ट जैसी परियोजनाओं को लेकर नए सिरे से वैज्ञानिक मानकों पर समीक्षा जरूरी है।
विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि हिमालयी राज्यों को अपनी विकास नीतियों में स्थानीय भूगोल और पर्यावरणीय संवेदनशीलता को प्राथमिकता देनी होगी। “सतत विकास” की अवधारणा को अपनाए बिना भविष्य सुरक्षित नहीं किया जा सकता।
हिमालयी क्षेत्र में इस तरह की चेतावनियां पहले भी दी गई हैं, लेकिन हाल की आपदाओं ने इसे और अधिक गंभीर बना दिया है। वैज्ञानिकों का साफ कहना है कि अब समय हाथ से निकलता जा रहा है, इसलिए केंद्र और राज्य सरकारों को जल्द से जल्द ठोस कदम उठाने होंगे।





