नई दिल्ली: मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव और युद्ध की आहट के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक शांति को लेकर भारत का पक्ष पूरी दुनिया के सामने मजबूती से रखा है। एक उच्चस्तरीय कार्यक्रम के दौरान पीएम मोदी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि दुनिया के किसी भी विवाद या मुद्दे का हल सिर्फ ‘आर्मी’ या सैन्य ताकत से नहीं निकाला जा सकता। उन्होंने वैश्विक शक्तियों को चेतावनी देते हुए कहा कि युद्ध केवल विनाश लाता है, समाधान नहीं। पीएम मोदी की इस ‘दो टूक’ टिप्पणी को यूक्रेन संघर्ष के बाद अब अमेरिका-ईरान तनाव के संदर्भ में भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक अपील माना जा रहा है।
प्रधानमंत्री का कड़ा संदेश: शांति और संवाद पर जोर
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के महत्व को रेखांकित किया:
- संवाद की शक्ति: पीएम मोदी ने कहा कि 21वीं सदी में हमें हथियारों के बजाय मेज पर बैठकर बातचीत (Dialogues) के जरिए रास्ते निकालने होंगे। उन्होंने दोहराया कि इतिहास गवाह है कि बड़े से बड़े युद्ध का अंत भी अंततः बातचीत से ही हुआ है।
- युद्ध का युग नहीं: पीएम ने अपने प्रसिद्ध नारे को फिर से दोहराते हुए कहा कि “आज का युग युद्ध का नहीं है।” उन्होंने वैश्विक नेताओं से अपील की कि वे आम नागरिकों और वैश्विक अर्थव्यवस्था के हितों को ध्यान में रखकर कदम उठाएं।
- वैश्विक प्रभाव: उन्होंने आगाह किया कि अमेरिका और ईरान के बीच किसी भी प्रकार का टकराव केवल उन दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे पूरी दुनिया में ईंधन का संकट और आर्थिक अस्थिरता पैदा होगी।
भारत के लिए क्यों जरूरी है शांति?
प्रधानमंत्री के इस कड़े रुख के पीछे भारत के रणनीतिक और आर्थिक हित भी जुड़े हैं:
- ऊर्जा सुरक्षा: भारत अपनी तेल और गैस की जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है। युद्ध होने पर कच्चे तेल की कीमतें $150 के पार जा सकती हैं, जिससे भारत में महंगाई अनियंत्रित हो जाएगी।
- भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा: पश्चिम एशिया में लगभग 90 लाख भारतीय रहते हैं। युद्ध की स्थिति में उनकी सुरक्षा और भारत वापसी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।
- चाबहार और व्यापार: ईरान में भारत का चाबहार बंदरगाह और मध्य एशिया तक पहुँचने का व्यापारिक मार्ग इस युद्ध की भेंट चढ़ सकता है।
कूटनीतिक संतुलन: भारत की ‘तटस्थ’ भूमिका
विशेषज्ञों का मानना है कि पीएम मोदी का यह बयान भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ को दर्शाता है:
- अमेरिका से मित्रता: भारत अमेरिका का करीबी साझेदार है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह अमेरिका के हर सैन्य फैसले का समर्थन करे।
- ईरान से संबंध: भारत और ईरान के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध हैं। भारत ने हमेशा ईरान के साथ शांतिपूर्ण समाधान की वकालत की है।
- मध्यस्थ की भूमिका: दुनिया के कई देश अब भारत की ओर एक ऐसे मध्यस्थ (Mediator) के रूप में देख रहे हैं जो दोनों पक्षों से बात करने की क्षमता रखता है।





