नई दिल्ली/लेह: भारतीय सेना की ताकत केवल आधुनिक हथियारों और जांबाज सैनिकों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें उन ‘विशेष साथियों’ का भी बड़ा योगदान है जो बिना कुछ बोले देश की संप्रभुता की रक्षा में जुटे हैं। सियाचिन के शून्य से 50 डिग्री नीचे के तापमान वाली बर्फीली पहाड़ियों से लेकर राजस्थान के तपते थार रेगिस्तान तक, भारतीय सेना के घोड़े, खच्चर, ऊंट और खोजी कुत्ते (Army Dogs) रीढ़ की हड्डी की तरह काम कर रहे हैं। हाल ही में सेना ने इन पशुओं के अदम्य साहस और निस्वार्थ सेवा के सम्मान में विशेष आयोजन किए हैं, जिससे उनकी भूमिका एक बार फिर दुनिया के सामने आई है।
RVC: भारतीय सेना की ‘लाइफलाइन’
भारतीय सेना का ‘रीमाउंट वेटरनरी कोर’ (RVC) इन पशुओं को प्रशिक्षित करने और उनकी देखभाल करने का जिम्मा संभालता है।
- खच्चरों का पराक्रम: कश्मीर और लद्दाख के उन दुर्गम क्षेत्रों में जहाँ कोई वाहन नहीं पहुँच सकता, वहाँ खच्चर (Army Mules) राशन, गोला-बरूद और दवाइयां पहुँचाते हैं।
- शौर्य की मिसाल: कई खच्चरों को उनकी वीरता के लिए ‘मेंशन-इन-डिस्पैच’ (Militarily honored) से नवाजा जा चुका है, जो यह दर्शाता है कि सेना उन्हें केवल जानवर नहीं, बल्कि अपना अभिन्न हिस्सा मानती है।
थार के जहाज और सियाचिन के जांबाज डॉग्स
विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों में इन पशुओं की भूमिका अलग लेकिन समान रूप से महत्वपूर्ण है:
- बॉर्डर स्काउट ऊंट: राजस्थान और गुजरात की सीमा पर सीमा सुरक्षा बल (BSF) और सेना के ऊंट गश्त करते हैं। इनकी विशेष प्रजातियां रात के अंधेरे में भी दुश्मन की आहट पहचानने में सक्षम हैं।
- स्निफर और रेस्क्यू डॉग्स: सेना के खोजी कुत्ते बम का पता लगाने, मलबे में दबे सैनिकों को ढूँढने और आतंकियों के ठिकानों को ट्रैक करने में माहिर होते हैं। ‘एक्सल’, ‘जूम’ और ‘कैस्पर’ जैसे कई शूरवीर डॉग्स ने देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया है।
- घुड़सवार दस्ता (61 Cavalry): दुनिया की आखिरी सक्रिय घुड़सवार रेजिमेंटों में से एक भारतीय सेना के पास है, जो परंपरा और युद्ध कौशल का अद्भुत संगम है।
सेवानिवृत्ति के बाद भी सम्मान: ‘ओल्ड एज होम’ की सुविधा
भारतीय सेना अपने इन साथियों के साथ न्याय करने में पीछे नहीं रहती।
- रिटायरमेंट पॉलिसी: एक निश्चित आयु के बाद इन पशुओं को कठिन डयूटी से मुक्त कर दिया जाता है।
- सुविधाएं: मेरठ और अन्य केंद्रों पर इनके लिए विशेष ‘ओल्ड एज होम’ बनाए गए हैं, जहाँ इनका इलाज और देखभाल बिल्कुल वैसे ही की जाती है जैसे एक पूर्व सैनिक की होती है। अब इन्हें सेवा के बाद मारने (Euthanasia) की परंपरा को पूरी तरह खत्म कर दिया गया है।
प्रौद्योगिकी के दौर में भी अपरिहार्य
भले ही सेना अब ‘रोबोटिक डॉग्स’ और ड्रोन का इस्तेमाल कर रही है, लेकिन सेना के अधिकारियों का मानना है कि जानवरों की सहज बुद्धि (Instinct) और वफादारी का कोई विकल्प नहीं है।
- पहाड़ों के साथी: लद्दाख जैसी जगहों पर जहाँ मशीनें फेल हो जाती हैं, वहाँ एक खच्चर ही सैनिक का सबसे भरोसेमंद साथी होता है।
- अटूट बंधन: एक सैनिक और उसके घोड़े या कुत्ते के बीच का भावनात्मक लगाव युद्ध के मैदान में मनोबल बढ़ाने का काम करता है।
“इन बेजुबान योद्धाओं का योगदान शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। इन्होंने कठिन से कठिन परिस्थितियों में हमारी रसद आपूर्ति को बनाए रखा है और कई मौकों पर सैनिकों की जान बचाई है। भारतीय सेना अपने इन ‘स्पेशल साथियों’ के प्रति सदैव कृतज्ञ रहेगी।” — जनरल, भारतीय सेना





