संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के कामकाज और निर्णय लेने की मौजूदा प्रक्रिया पर भारत ने गहरी चिंता जताते हुए स्पष्ट तौर पर कहा है कि संगठन में पारदर्शिता बढ़ाना अब समय की मांग है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर सुरक्षा परिषद के भीतर होने वाली बंद कमरे की बैठकों और सीमित संवाद को लेकर सवाल उठाए हैं।
निर्णय प्रक्रिया पर भारत की आपत्ति
भारत ने कहा कि परिषद के कामकाज का तरीका न केवल अपारदर्शी है, बल्कि यह सदस्य देशों की लोकतांत्रिक भागीदारी को भी सीमित करता है। भारत के प्रतिनिधि ने कहा कि कई मुद्दों पर परिषद के भीतर वास्तविक विमर्श के बजाय कुछ स्थायी सदस्य देशों के बीच अनौपचारिक सहमति बन जाती है और बाद में उसे पूरे संगठन की राय के रूप में प्रस्तुत कर दिया जाता है।
सुधार और पारदर्शिता की वकालत
भारत ने जोर देकर कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार, उसके ढांचे के विस्तार और कार्यप्रणाली को अधिक खुला और जवाबदेह बनाने की दिशा में ठोस कदम जरूरी हैं। भारत ने याद दिलाया कि वर्षों से सुधार की चर्चा चल रही है, लेकिन वास्तविक प्रगति अभी भी धीमी है, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में असंतोष बढ़ रहा है।
भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि सुरक्षा परिषद की विश्वसनीयता तभी सुनिश्चित होगी जब उसकी बैठकों, संवाद और प्रस्तावों के गठन की प्रक्रिया में व्यापक पारदर्शिता और सदस्य देशों की वास्तविक भागीदारी हो।
भारत की स्थायी सदस्यता का मुद्दा भी उभरा
अपनी बात में भारत ने यह भी संकेत दिया कि दुनिया में तेजी से बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए सुरक्षा परिषद को प्रतिनिधित्व और जिम्मेदारियों के नए समीकरण के साथ आगे बढ़ना चाहिए। भारत पहले भी कह चुका है कि वह दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्तियों में से एक है, शांति अभियानों में सबसे बड़ा योगदानकर्ता है और वैश्विक राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाता है, ऐसे में उसे परिषद में स्थायी सदस्यता मिलना स्वाभाविक है।
वैश्विक समर्थन का हवाला
भारत ने अपनी दलील के समर्थन में यह भी याद दिलाया कि कई देशों और समूहों ने परिषद में सुधार, विशेषकर भारत सहित अन्य उभरती शक्तियों को स्थायी सदस्यता देने के पक्ष में जोरदार समर्थन व्यक्त किया है।
निष्कर्ष
भारत की यह दो-टूक मांग एक बार फिर साफ कर देती है कि वह सुरक्षा परिषद की मौजूदा कार्यप्रणाली से संतुष्ट नहीं है और अंतरराष्ट्रीय शांति व्यवस्था को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण तथा न्यायसंगत बनाने के लिए संरचनात्मक बदलावों पर जोर देता रहेगा।





