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वैश्विक स्थिरता के लिए ‘त्रिशक्ति’ की ओर देख रहा ईरान: अमेरिका के साथ बढ़ते तनाव के बीच भारत, रूस और चीन की भूमिका को बताया अहम

मुंबई/तेहरान। मध्य पूर्व में गहराते सैन्य संकट और अमेरिका के साथ बढ़ते कूटनीतिक तनाव के बीच ईरान ने वैश्विक शांति बहाली के लिए भारत की भूमिका की जमकर सराहना की है। मुंबई में ईरान के महावाणिज्यदूत सईद रजा मोसयेब मोतलाघ ने एक महत्वपूर्ण बयान में कहा कि क्षेत्रीय स्थिरता स्थापित करने के लिए भारत, रूस और चीन का एक साथ खड़ा होना अनिवार्य है। उन्होंने नई दिल्ली की कूटनीति की प्रशंसा करते हुए कहा कि भारत ने हमेशा सैन्य हस्तक्षेप के स्थान पर शांतिपूर्ण समाधान और संवाद को प्राथमिकता दी है।

‘अमेरिकी युद्धोन्माद’ के खिलाफ कूटनीतिक दीवार

ईरानी राजनयिक ने पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका के कड़े रुख की आलोचना करते हुए कहा कि वैश्विक शक्तियों का संतुलन अब बदल रहा है।

  • रचनात्मक भूमिका: मोतलाघ के अनुसार, अमेरिका द्वारा पैदा किए जा रहे ‘युद्धोन्माद’ (War Hysteria) को रोकने में भारत, रूस और चीन की भूमिका निर्णायक होगी। इन देशों ने साबित किया है कि वे सैन्य गठबंधन के बजाय आर्थिक स्थिरता और वैश्विक शांति के समर्थक हैं।
  • शांति की अटूट प्रतिबद्धता: उन्होंने रेखांकित किया कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने हितों को जोखिम में डालकर भी कूटनीतिक मर्यादा बनाए रखी है और किसी भी प्रकार के अनावश्यक संघर्ष का हिस्सा बनने से इनकार किया है।

निष्पक्षता और संयम की मिसाल: ‘न समर्थन, न हस्तक्षेप’

ईरान ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि भारत, चीन और रूस ने मौजूदा संकट में एक संतुलित और निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाया है, जो वैश्विक शांति के लिए अनुकरणीय है।

  • सैन्य सहायता से दूरी: मोसयेब मोतलाघ ने स्पष्ट किया, “इन तीनों देशों ने न तो अमेरिकी हमलों का समर्थन किया और न ही वे ईरान को सैन्य सहायता प्रदान करने की स्थिति में खड़े हुए। इसके बजाय, उन्होंने संयम बरतते हुए आर्थिक बाजारों को अस्थिर होने से बचाने और युद्ध को टालने का प्रयास किया।”
  • आर्थिक स्थिरता पर ध्यान: ईरान का मानना है कि भारत जैसी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं यह समझती हैं कि युद्ध से केवल तबाही आती है, इसलिए वे अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों और ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए कूटनीति का उपयोग कर रही हैं।

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