नई दिल्ली। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सरकारी और सार्वजनिक कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण के अनिवार्य गायन को लेकर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय गीत के प्रति सम्मान और उसके पूरे संस्करण को हर अवसर पर गाने की बाध्यता, दोनों अलग-अलग बातें हैं।
थरूर ने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ देश की स्वतंत्रता संग्राम की विरासत और राष्ट्रीय गौरव का महत्वपूर्ण प्रतीक है, लेकिन इसे हर कार्यक्रम में पूर्ण रूप से गाने की अनिवार्यता दर्शकों और आयोजकों पर एक अतिरिक्त बोझ बन सकती है। उनके अनुसार, देशभक्ति और राष्ट्रीय सम्मान को किसी अनिवार्य प्रक्रिया से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
कांग्रेस सांसद का मानना है कि राष्ट्रीय गीत का सम्मान बनाए रखने के लिए उसके पूर्ण गायन को हर अवसर पर लागू करना आवश्यक नहीं है। उन्होंने कहा कि लोगों की भावनात्मक जुड़ाव और सम्मान की भावना अधिक महत्वपूर्ण है, न कि केवल औपचारिक अनुपालन।
थरूर की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब हाल के महीनों में ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण को सरकारी आयोजनों और कुछ सार्वजनिक कार्यक्रमों में लेकर राजनीतिक बहस तेज हुई है। इस मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दलों और नेताओं के अलग-अलग मत सामने आए हैं।
भाजपा और उसके समर्थक राष्ट्रीय गीत के व्यापक उपयोग को राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक विरासत से जोड़कर देखते हैं, जबकि विपक्ष के कुछ नेता इसे अनिवार्य बनाने के प्रयासों पर सवाल उठा रहे हैं। इसी क्रम में थरूर ने भी स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान जरूरी है, लेकिन उन्हें लेकर किसी प्रकार का “अनावश्यक थोपना” उचित नहीं माना जा सकता।
थरूर के बयान के बाद राजनीतिक हलकों में इस मुद्दे पर नई बहस शुरू हो गई है। आने वाले दिनों में इस विषय पर विभिन्न दलों की प्रतिक्रियाएं और तेज होने की संभावना है।





