रानीखेत/नई दिल्ली: कुमाऊं के सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक सैन्य क्षेत्रों में शुमार रानीखेत छावनी परिषद (Ranikhet Cantt) समेत देशभर के 56 कैंट बोर्डों में होने वाले चुनावों को एक बार फिर टाल दिया गया है। केंद्र सरकार के इस फैसले के बाद छावनी क्षेत्रों में लंबे समय से चुनावी सुगबुगाहट देख रहे स्थानीय निवासियों और भावी प्रत्याशियों को बड़ा झटका लगा है। रक्षा मंत्रालय ने इस संबंध में औपचारिक अधिसूचना जारी कर दी है।
तीसरी बार टाले गए चुनाव
गौरतलब है कि देशभर के इन छावनी परिषदों का कार्यकाल काफी समय पहले ही समाप्त हो चुका है। इससे पहले भी दो बार चुनाव कराने की तैयारी की गई थी, लेकिन किन्हीं कारणों से उन्हें स्थगित करना पड़ा था। अब तीसरी बार चुनाव टलने से रानीखेत जैसे क्षेत्रों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली का इंतज़ार और लंबा हो गया है। फिलहाल अगले आदेश तक बोर्ड का कामकाज नामित सदस्यों और सैन्य अधिकारियों के माध्यम से ही जारी रहेगा।
क्या है चुनाव टलने की मुख्य वजह?
सूत्रों और प्रशासनिक जानकारी के अनुसार, चुनाव टलने की सबसे बड़ी वजह छावनी क्षेत्रों के सिविल एरिया (Civil Areas) को नगर निकायों में शामिल करने की प्रक्रिया है।
- विलय की योजना: केंद्र सरकार देश के कई कैंट बोर्डों के नागरिक क्षेत्रों को संबंधित नगर पालिकाओं या नगर निगमों में मर्ज (Merge) करने की योजना पर काम कर रही है।
- सीमांकन का कार्य: रानीखेत समेत कई कैंट बोर्डों में सीमांकन और संपत्तियों के हस्तांतरण की प्रक्रिया अभी पाइपलाइन में है।
- नीतिगत निर्णय: जब तक यह स्पष्ट नहीं हो जाता कि कौन सा क्षेत्र कैंट के अधीन रहेगा और कौन सा नगर निकाय में जाएगा, तब तक चुनाव कराना तकनीकी रूप से संभव नहीं माना जा रहा है।
रानीखेत कैंट में बढ़ी बेचैनी
रानीखेत छावनी परिषद कुमाऊं का सबसे बड़ा सैन्य क्षेत्र है। यहाँ चुनाव टलने से उन नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं में निराशा है जो पिछले कई महीनों से वार्डों में जनसंपर्क कर रहे थे। स्थानीय लोगों का मानना है कि बोर्ड में निर्वाचित प्रतिनिधियों के न होने से नागरिक समस्याओं जैसे सड़क, पानी और सफाई के मुद्दों पर प्रभावी सुनवाई नहीं हो पा रही है।
अब आगे क्या?
रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी आदेश के अनुसार, बोर्डों के कार्यकाल को फिलहाल अगले छह महीने या आगामी आदेश तक के लिए बढ़ा दिया गया है। इस दौरान सरकार नागरिक क्षेत्रों को अलग करने की जटिल प्रक्रिया को अंतिम रूप दे सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह विलय प्रक्रिया सफल रहती है, तो आने वाले समय में इन क्षेत्रों में कैंट बोर्ड के बजाय निकाय चुनाव देखने को मिल सकते हैं।





