पेरिस/बर्लिन: यूरोपीय संघ के शक्तिशाली देशों—फ्रांस, जर्मनी और ऑस्ट्रिया—ने वैश्विक डिजिटल परिदृश्य में एक बड़ा उलटफेर करते हुए अमेरिका के तकनीकी एकाधिकार (Monopoly) को कड़ी चुनौती दी है। डेटा संप्रभुता और गोपनीयता (Privacy) के मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए इन देशों ने अमेरिकी टेक दिग्गजों (Google, Meta, Amazon) पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए एक नए और स्वतंत्र डिजिटल सिस्टम की नींव रख दी है। इसे ‘डिजिटल संप्रभुता’ की दिशा में यूरोप का अब तक का सबसे बड़ा कदम माना जा रहा है, जिससे सिलिकॉन वैली की कंपनियों के लिए यूरोपीय बाजारों में काम करने के नियम पूरी तरह बदल गए हैं।
क्यों शुरू हुआ यह विवाद? ‘डिजिटल झटके’ की मुख्य वजह
यूरोपीय देशों की इस नाराजगी और सिस्टम बदलने के पीछे कई गंभीर कारण रहे हैं:
- डेटा गोपनीयता (Data Privacy): यूरोपीय नियामकों का तर्क है कि अमेरिकी कंपनियां यूरोपीय नागरिकों का डेटा अमेरिका स्थित सर्वरों में स्टोर करती हैं, जहाँ अमेरिकी खुफिया एजेंसियां उन तक पहुंच सकती हैं। यह यूरोप के सख्त ‘GDPR’ कानूनों का उल्लंघन है।
- स्वदेशी क्लाउड प्रोजेक्ट: फ्रांस और जर्मनी ने मिलकर ‘गाइया-एक्स’ (Gaia-X) जैसे प्रोजेक्ट्स पर काम तेज कर दिया है, जो अमेरिकी क्लाउड सेवाओं (AWS, Azure) का विकल्प प्रदान करेंगे।
- डिजिटल टैक्स: ऑस्ट्रिया और फ्रांस ने अमेरिकी टेक कंपनियों पर ‘डिजिटल सेवा कर’ (Digital Services Tax) लगाकर उनके अनियंत्रित मुनाफे पर लगाम कसनी शुरू कर दी है।
फ्रांस-जर्मनी और ऑस्ट्रिया की ‘त्रिकोणीय’ रणनीति
तीनों देशों ने मिलकर अमेरिकी सिस्टम को टक्कर देने के लिए तीन स्तरों पर बदलाव किए हैं:
- सॉफ्टवेयर और टूल्स: ऑस्ट्रिया ने कई सरकारी और शैक्षिक संस्थानों में ‘गूगल एनालिटिक्स’ के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है, इसे अवैध करार देते हुए स्थानीय यूरोपीय विकल्पों को अपनाने का निर्देश दिया है।
- सर्च इंजन और ब्राउज़र: फ्रांस और जर्मनी अपनी सरकारी मशीनरी में ‘क्वॉट’ (Qwant) जैसे यूरोपीय सर्च इंजनों को बढ़ावा दे रहे हैं, जो उपयोगकर्ताओं की ट्रैकिंग नहीं करते।
- पेमेंट गेटवे: अमेरिकी वीज़ा (Visa) और मास्टरकार्ड (Mastercard) के प्रभुत्व को कम करने के लिए ‘यूरोपियन पेमेंट्स इनिशिएटिव’ (EPI) को पुनर्जीवित किया गया है, ताकि यूरोप का अपना स्वतंत्र भुगतान तंत्र हो।
अमेरिका की प्रतिक्रिया और वैश्विक प्रभाव
इस ‘डिजिटल विद्रोह’ से वाशिंगटन में चिंता की लहर है:
- व्यापारिक युद्ध की आशंका: अमेरिका ने चेतावनी दी है कि यदि यूरोपीय देश उनकी कंपनियों को निशाना बनाना जारी रखते हैं, तो वह जवाबी कार्रवाई के तौर पर यूरोपीय उत्पादों (जैसे फ्रेंच वाइन या जर्मन कारों) पर टैरिफ लगा सकता है।
- अन्य देशों के लिए मिसाल: भारत और ब्राजील जैसे बड़े बाजार भी यूरोप के इस कदम को गौर से देख रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे ‘तकनीकी राष्ट्रवाद’ (Tech Nationalism) का दौर शुरू हो सकता है।
निष्कर्ष: बदल जाएगी इंटरनेट की दुनिया
यूरोप के इस कदम का अर्थ है कि अब इंटरनेट का स्वरूप ‘एक जैसा’ नहीं रहेगा। इसे ‘स्प्लिंटरनेट’ (Splinternet) कहा जा रहा है, जहाँ अलग-अलग महाद्वीपों के अपने नियम और अपनी तकनीक होगी। फ्रांस और जर्मनी ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अपनी जनता का डेटा किसी भी विदेशी शक्ति के हाथों की कठपुतली नहीं बनने देंगे।
“डिजिटल संप्रभुता का मतलब यह नहीं है कि हम दुनिया से कट रहे हैं, बल्कि इसका मतलब यह है कि हम अपने डेटा और अपने भविष्य के मालिक खुद होंगे। यूरोप अब केवल एक बाजार नहीं, बल्कि एक तकनीक निर्माता बनेगा।” — फ्रांसीसी डिजिटल मंत्री





