नई दिल्ली।
शंघाई सहयोग संगठन (SCO) सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की त्रिपक्षीय मुलाकात ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में हलचल मचा दी है। इस बैठक को वैश्विक शक्ति संतुलन के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। खास बात यह रही कि इस मुलाकात के बाद अमेरिका के सुर भी कुछ हद तक नरम दिखाई दिए।
सोशल मीडिया पर इस चर्चा के बीच अमेरिकी सीनेटर मार्को रुबियो का बयान सुर्खियों में आ गया। रुबियो ने कहा कि एशिया में तेजी से बदलते समीकरणों को देखते हुए अमेरिका को अपनी रणनीति में लचीलापन अपनाना होगा। उन्होंने लिखा, “भारत जैसे देशों के साथ साझेदारी हमारे लिए अनिवार्य है, क्योंकि भारत केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक नेतृत्व में भी बड़ी भूमिका निभा रहा है।” उनका यह बयान सोशल मीडिया पर खूब साझा किया जा रहा है और इसे अमेरिका की बदली हुई कूटनीतिक सोच के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
कूटनीतिक हलकों का कहना है कि मोदी–पुतिन–चिनफिंग की बातचीत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत एशिया में शक्ति संतुलन का केंद्र बिंदु बन चुका है। जहां अमेरिका भारत से रूस से दूरी बनाने की अपील करता रहा है, वहीं अब उसकी ओर से पहले की तुलना में नरमी देखने को मिल रही है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका की यह नई रणनीतिक भाषा इस बात का संकेत है कि वॉशिंगटन भारत की अहमियत को और गहराई से समझ रहा है। रूस–चीन के साथ भारत की सक्रियता अमेरिका को मजबूर कर रही है कि वह नई दिल्ली के साथ संबंधों को और मजबूत करने पर विचार करे।
भारत ने इस मुलाकात में ऊर्जा, आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। विदेश नीति के जानकार मानते हैं कि मोदी–पुतिन–चिनफिंग की यह बैठक आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन को नया आयाम दे सकती है।





