नई दिल्ली/मथुरा: भारत के 100 से अधिक शहरों में गर्मी का तांडव अब केवल मौसम का मिजाज नहीं, बल्कि एक गंभीर पर्यावरणीय संकट बन चुका है। हाल ही में जारी एक विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन (स्टडी) में यह खुलासा हुआ है कि मथुरा, मुजफ्फरनगर और जालंधर जैसे शहर देश के अन्य हिस्सों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से तप रहे हैं। स्टडी के अनुसार, इन शहरों का तापमान सामान्य से 3 से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया जा रहा है। विशेषज्ञों ने इस खतरनाक स्थिति के लिए अनियोजित शहरीकरण और ‘अर्बन हीट आइलैंड’ (Urban Heat Island) प्रभाव को मुख्य जिम्मेदार ठहराया है।
स्टडी के मुख्य निष्कर्ष: क्यों बढ़ रहा है पारा?
वैज्ञानिकों ने इन 100 शहरों के डेटा का विश्लेषण करने के बाद तीन प्रमुख कारणों को रेखांकित किया है:
- कंक्रीट का जाल और हरियाली का अंत: मथुरा और जालंधर जैसे तेजी से विकसित होते शहरों में कंक्रीट की इमारतों और डामर (Asphalt) की सड़कों की अधिकता है। ये सतहें दिन भर सूरज की गर्मी को सोखती हैं और रात में उसे धीरे-धीरे छोड़ती हैं, जिससे रातें भी ठंडी नहीं हो पा रही हैं।
- अर्बन हीट आइलैंड (UHI) प्रभाव: शहरों के घने बसे इलाकों का तापमान ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में काफी अधिक हो जाता है। ऊँची इमारतें हवा के बहाव को रोकती हैं, जिससे गर्मी एक ही जगह कैद होकर रह जाती है।
- बढ़ता प्रदूषण और ‘एरोसोल’: मुजफ्फरनगर जैसे औद्योगिक और कृषि प्रधान क्षेत्रों में हवा में मौजूद धूल के कण और धुआं (एरोसोल) गर्मी को वातावरण में ही रोक लेते हैं, जिससे ‘ग्रीनहाउस प्रभाव’ पैदा होता है।
मथुरा-मुजफ्फरनगर की स्थिति सबसे चिंताजनक
अध्ययन में उत्तर प्रदेश और पंजाब के शहरों पर विशेष ध्यान दिया गया है:
- मथुरा का संकट: यहाँ तेजी से होते निर्माण कार्यों और वृक्षों की अंधाधुंध कटाई के कारण भूमिगत जल स्तर गिरा है, जिससे मिट्टी की नमी खत्म हो गई है और सतह का तापमान बढ़ गया है।
- जालंधर का इंडस्ट्रियल हीट: औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाली गर्मी और वाहनों के भारी दबाव ने जालंधर को एक ‘हॉटस्पॉट’ में बदल दिया है।
- मुजफ्फरनगर और पश्चिमी यूपी: यहाँ खेती के तरीकों में बदलाव और पराली जलाने जैसी घटनाओं ने स्थानीय सूक्ष्म जलवायु (Micro-climate) को बिगाड़ दिया है।
स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर असर
बढ़ते तापमान का असर केवल मौसम तक सीमित नहीं है, इसके दूरगामी परिणाम सामने आ रहे हैं:
- हीट स्ट्रोक के मामलों में वृद्धि: इन शहरों के अस्पतालों में गर्मी से जनित बीमारियों के मरीजों की संख्या में 30% का इजाफा हुआ है।
- बिजली की भारी मांग: पारा बढ़ने से एसी और कूलरों का इस्तेमाल बढ़ा है, जिससे पावर ग्रिड पर दबाव बढ़ रहा है और बार-बार कटौती हो रही है।
- कृषि पर प्रभाव: समय से पहले बढ़ती गर्मी रबी की फसलों, विशेषकर गेहूं की पैदावार को नुकसान पहुंचा रही है।
विशेषज्ञों की राय: क्या है समाधान?
पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि अभी कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दशकों में ये शहर रहने लायक नहीं बचेंगे।
“हमें अपने शहरी नियोजन में ‘कूल रूफ’ (सफेद छतें), वर्टिकल गार्डन और जलाशयों के पुनरुद्धार को प्राथमिकता देनी होगी। केवल पेड़ लगाना काफी नहीं है, हमें शहरों के भीतर ‘ग्रीन कॉरिडोर्स’ बनाने होंगे ताकि हवा का प्राकृतिक प्रवाह बना रहे।” — डॉ. आर. के. शर्मा, पर्यावरण वैज्ञानिक





